
नई दिल्ली। इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा के खिलाफ लोकसभा में महाभियोग चलाने की तैयारी पर विराम लग सकता है। संसद में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश करने की पूरी रूपरेखा तैयार हो चुकी थी और इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय जांच समिति की रिपोर्ट भी सौंपी जा चुकी थी। हालांकि, मीडिया रिपोर्टों और सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक, अब संसद के निचले सदन में यह प्रस्ताव नहीं लाया जाएगा। पद से पहले ही इस्तीफा दे देने के कारण इस कार्यवाही को संसद के आगामी सत्र में औपचारिक रूप से समाप्त (क्लोज) किए जाने की प्रबल संभावना है। 200 सांसदों के हस्ताक्षर वाले इस प्रस्ताव के ठंडे बस्ते में जाने को पूर्व जज के लिए बड़ी कानूनी व प्रशासनिक राहत के तौर पर देखा जा रहा है।
पद छोड़ने से महाभियोग क्यों टला, पूर्व जज को क्या मिलेंगे लाभ?
संसद में महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ने से पहले ही जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था। जानकारों के अनुसार, यदि संसद में महाभियोग प्रस्ताव पारित कर किसी न्यायाधीश को पद से हटाया जाता, तो वे सभी उत्तर-दायित्वों और सेवानिवृत्ति परिलाभों से वंचित हो जाते। लेकिन महाभियोग प्रस्ताव औपचारिक रूप से न आने की स्थिति में वे एक सामान्य सेवानिवृत्त न्यायाधीश की तरह सभी तय सुविधाओं के हकदार बने रहेंगे। इनमें नियमित पेंशन, सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली चिकित्सकीय सुविधाएं, प्रोटोकॉल के तहत मिलने वाली सुरक्षा और नियमानुसार मिलने वाला सरकारी आवास का प्रावधान शामिल है। इसके अलावा, यदि संसद में बहस होती तो जांच से जुड़े कई संवेदनशील दस्तावेज और नए तथ्य सार्वजनिक पटल पर आ सकते थे, जिस पर अब पर्दा रहने की संभावना है।
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट से FIR की अर्जी खारिज, साल्वे ने उठाए थे सवाल
अगस्त में संसद ने जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली जांच समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक पटल पर रखा था। इस रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा पर लगे आरोपों को प्रथम दृष्टया सही माना गया था और रेखांकित किया गया था कि बरामद बेहिसाब नकदी की जानकारी उन्हें थी। रिपोर्ट सामने आने के बाद शीर्ष अदालत में एक याचिका दायर कर पूर्व जज के खिलाफ आपराधिक मामला (एफआईआर) दर्ज करने की अनुमति मांगी गई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सुनने से इनकार कर दिया। इसके बाद सितंबर 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी इसी प्रकार की एक याचिका खारिज कर दी। वर्तमान स्थिति यह है कि इस पूरे मामले में उनके खिलाफ कोई भी एफआईआर दर्ज नहीं है। इस कानूनी स्थिति पर वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने एक सार्वजनिक मंच से तीखा सवाल उठाते हुए कहा था कि यदि किसी कैबिनेट मंत्री के घर से इस प्रकार भारी मात्रा में नकदी मिलती, तो क्या जांच एजेंसियां बिना एफआईआर दर्ज किए यूं ही बैठ जातीं?
आधी रात को लगी आग और सामने आया नोटों का जखीरा
यह पूरा विवाद 14-15 मार्च 2025 की दरमियानी रात को शुरू हुआ था। नई दिल्ली के 30, तुगलक क्रिसेंट स्थित आधिकारिक आवास के स्टोररूम में अचानक आग लगने की सूचना दमकल विभाग को दी गई थी। आग बुझाने के अभियान के दौरान दमकल कर्मियों और दिल्ली पुलिस के अधिकारियों ने वहां 500 रुपये के नोटों के बंडल देखे, जो जले, अधजले, पानी से भीगे और फर्श पर बिखरे पड़े थे। मामला तूल पकड़ते ही लोकसभा अध्यक्ष ने तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया। इस समिति ने 9 गवाहों के बयान और 14 दस्तावेजी व भौतिक साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी, जिसमें पूर्व जज को क्लीनचिट देने से साफ इनकार कर दिया गया था।
जांच समिति की रिपोर्ट के दो सबसे प्रमुख निष्कर्ष:
-
आवासीय परिसर का नियंत्रण: जस्टिस वर्मा ने अपने बचाव में दलील दी थी कि जिस स्टोररूम में नकदी पाई गई, उससे उनका सीधा सरोकार नहीं था। समिति ने इसे खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि भले ही स्टोररूम मुख्य रिहाइश से थोड़ा अलग था, लेकिन वह 30, तुगलक क्रिसेंट स्थित उनके अधिकृत आवासीय परिसर के अंदर ही था और उसके उपयोग व लॉकर की स्थिति की पूरी जानकारी उन्हें थी।
-
साक्ष्यों की सुरक्षा में गंभीर चूक: रिपोर्ट का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण बिंदु साक्ष्यों की उपेक्षा से जुड़ा है। समिति ने पाया कि मौके पर मिले नोटों को न तो तत्काल जब्त किया गया, न कोई आधिकारिक पंचनामा बना और न ही प्राथमिक स्तर पर स्टोररूम को सील किया गया। इसके बाद वहां सफाई करा दी गई, जिससे भौतिक साक्ष्य नष्ट हो गए। समिति ने इसे कानूनी प्रक्रिया में एक गंभीर और ‘मैटेरियल लैप्स’ माना।
voice of india