नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के संभल में वर्ष 2024 में भड़की सांप्रदायिक हिंसा के कथित मास्टरमाइंड मुल्ला अफरोज को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने मंगलवार को अहम फैसला सुनाते हुए मुल्ला अफरोज के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA), 1980 के तहत जारी हिरासत (प्रिवेंटिव डिटेंशन) आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया। इसके साथ ही, अदालत ने शक्तियों के दुरुपयोग और गैर-कानूनी हिरासत आदेश जारी करने पर उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का भारी जुर्माना भी लगाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें एनएसए की कार्रवाई को जायज ठहराया गया था।
पुलिस कस्टडी में कबूलनामा हिरासत का आधार नहीं: जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की संयुक्त पीठ ने इस संवेदनशील मामले पर फैसला सुनाते हुए कानून के दायरे को स्पष्ट किया। पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) लागू करने के लिए पुलिस हिरासत में दिया गया ‘एक्स्ट्रा-जुडिशियल कन्फेशन’ (अदालत के बाहर या पुलिस कस्टडी में कबूलनामा) एकमात्र कानूनी आधार नहीं हो सकता।
अदालत ने कहा कि हिरासत आदेश जारी करने वाले प्राधिकारी का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह मामले से जुड़ी सभी वस्तुनिष्ठ और निष्पक्ष परिस्थितियों की समीक्षा करे। मुल्ला अफरोज के मामले में अधिकारियों ने स्थापित कानूनी मानकों की अनदेखी की और प्रदत्त शक्तियों का मनमाना उपयोग किया, जिसके चलते अदालत ने राज्य सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना अधिरोपित किया।
क्या था संभल हिंसा का पूरा मामला?
यह पूरा विवाद संभल स्थित ऐतिहासिक शाही जामा मस्जिद के सिविल कोर्ट द्वारा दिए गए वीडियोग्राफी सर्वे के आदेश के बाद शुरू हुआ था। सर्वे के दौरान इलाके में अचानक तनाव बढ़ गया और बड़े पैमाने पर पथराव व हिंसा भड़क उठी, जिसमें गोली लगने से चार लोगों की मौत हो गई थी।
पुलिस ने मुल्ला अफरोज पर हिंसा की साजिश रचने और भीड़ को भड़काने का आरोप लगाया था। घटना के करीब 54 दिन बाद पुलिस ने एक अन्य आरोपी के पुलिस कस्टडी में दिए गए बयान के आधार पर मुल्ला अफरोज को गिरफ्तार किया। हालांकि, बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उसे नियमित जमानत दे दी थी।
जमानत के बाद लगा दिया गया था रासुका, सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
जमानत मिलने के बाद प्रशासन ने 13 अक्टूबर 2025 को मुल्ला अफरोज के खिलाफ एनएसए के तहत निवारक हिरासत का नया आदेश थमा दिया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रशासनिक आदेश को बरकरार रखा, जिसके बाद अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की।
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता के वकीलों ने मजबूती से दलील दी कि हिंसा के दौरान पुलिस की ओर से चलाई गई गोलियों की कोई निष्पक्ष जांच नहीं कराई गई थी और पीड़ित पक्ष को प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल करने की अनुमति मिलनी चाहिए।
सिर्फ मुकदमों की फेहरिस्त या आशंका पर नहीं लगाया जा सकता NSA
याचिकाकर्ता की ओर से शीर्ष अदालत में तर्क दिया गया कि पुलिस कस्टडी में लिया गया बयान साक्ष्य अधिनियम के तहत कानूनी तौर पर अमान्य है। महज किसी व्यक्ति के खिलाफ पुराने आपराधिक मामले दर्ज होना या बिना किसी ठोस आधार के यह आशंका जताना कि वह दोबारा कानून-व्यवस्था बिगाड़ सकता है, किसी भी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता छीनने का आधार नहीं बन सकता।
दलीलों के समर्थन में देश के ऐतिहासिक कानूनी नजीरों—’रेखा बनाम तमिलनाडु राज्य’ और ‘अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य’—का हवाला दिया गया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि बिना पुख्ता सबूतों के केवल पूर्वग्रह और आशंका पर प्रिवेंटिव डिटेंशन लागू नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार ने अपनी दलील में सार्वजनिक व्यवस्था और भविष्य में हिंसा की आशंका का हवाला देते हुए आदेश का बचाव करने की कोशिश की, लेकिन अदालत ने इसे कानून के सिद्धांतों के खिलाफ मानते हुए खारिज कर दिया।
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