Wednesday , 21 October 2026

Global Oil Market: ईरान युद्ध के बीच चीन ने पलटा तेल का खेल, आयातक होकर भी बना ‘सुपरपावर’; सऊदी और अमेरिका के एकाधिकार को तोड़ा

ईरान युद्ध की आग ने वैश्विक ऊर्जा बाजार के स्थापित समीकरणों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। दशकों से यह अलिखित नियम रहा है कि जिनके पास कच्चे तेल के कुएं हैं—चाहे वह सऊदी अरब की अगुवाई वाला ओपेक (OPEC) गुट हो या फिर अमेरिका—वही वैश्विक आपूर्ति और कच्चे तेल की कीमतों की चाल तय करते थे। तेल आयात करने वाले देशों को हमेशा उत्पादक मुल्कों के इशारों और उनकी मूल्य नीतियों के आगे झुकना पड़ता था। लेकिन दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देश चीन ने इस पूरे खेल का पासा पलट दिया है। चीन ने अपनी सबसे बड़ी मजबूरी यानी तेल के लिए दूसरों पर निर्भरता को अपनी सबसे बड़ी भू-राजनीतिक और रणनीतिक ताकत में तब्दील कर लिया है।

कीमतों का रिमोट कंट्रोल अब बीजिंग के हाथ में

चीन ने भारी मात्रा में कच्चे तेल का रणनीतिक भंडारण करके, अपनी रिफाइनिंग क्षमता को दुनिया में शीर्ष पर पहुंचाकर और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों में भारी निवेश कर यह मुकाम हासिल किया है। वर्तमान में वैश्विक तेल बाजार की दशा और दिशा उत्पादक देशों की मनमर्जी से तय नहीं हो रही है। चीन ने यह साबित कर दिया है कि वह जब चाहे बड़े पैमाने पर खरीदारी शुरू कर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ा सकता है और जब चाहे आयात रोककर कीमतों में भारी गिरावट ला सकता है। इसके अलावा, सोलर एनर्जी, विशाल हाई-स्पीड रेल नेटवर्क और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) के क्षेत्र में वैश्विक अगुवा होने के चलते चीन अब पारंपरिक कच्चे तेल का मोहताज नहीं रह गया है।

रणनीतिक ताकत का प्रदर्शन और ईंधन की कूटनीति

मध्य पूर्व में छिड़ी जंग के शुरुआती दौर में ही चीन ने अपने पड़ोसियों को ईंधन की आपूर्ति नियंत्रित कर अपनी कूटनीतिक धमक का अहसास कराया। जब पश्चिम एशिया के संकट के चलते अन्य एशियाई और पश्चिमी देशों के सामने ऊर्जा का गंभीर संकट खड़ा हो गया, तब उन देशों को या तो ईंधन की खपत घटानी पड़ी या फिर रिकॉर्ड तोड़ कीमतें चुकानी पड़ीं। इसके विपरीत, चीन के पास कच्चे तेल को पेट्रोल, डीजल और एविएशन टरबाइन फ्यूल (जेट ईंधन) में तब्दील करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनिंग इकाइयां मौजूद हैं। युद्ध के संवेदनशील समय में चीन ने इस क्षमता को कूटनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। उसने वियतनाम जैसे रणनीतिक साझेदारों को ईंधन की निर्बाध सप्लाई जारी रखी, जबकि फिलीपींस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की आपूर्ति में कटौती कर अपनी नाराजगी जाहिर की।

तीन रणनीतियों से तोड़ी तेल उत्पादक देशों की बादशाहत

चीन ने खुद को ऊर्जा बाजार का नया नियामक बनाने के लिए त्रिस्तरीय रणनीति पर काम किया। पहली रणनीति रही विशाल आपातकालीन भंडार की स्थापना। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बेहद निचले स्तर पर थे, तब चीन ने चुपचाप लाखों बैरल कच्चा तेल खरीदकर अपने रणनीतिक भूमिगत और तटीय टैंकों में भर लिया। आज स्थिति यह है कि दुनिया के कुल ज्ञात आपातकालीन तेल भंडार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा अकेले चीन के पास जमा है। दूसरी रणनीति सटीक समय पर आयात में कटौती की रही। जब युद्ध के कारण दुनिया भर में कच्चे तेल की किल्लत मची और कीमतें आसमान छूने लगीं, तब चीन ने महंगे दामों पर तेल खरीदने के बजाय अपने पुराने स्टॉक का इस्तेमाल शुरू कर दिया और कच्चे तेल के आयात में 23 फीसदी की भारी कटौती कर दी। इससे अंतरराष्ट्रीय कीमतों में अचानक ठहराव आ गया और निर्यातक देशों पर दबाव बन गया। तीसरी रणनीति घरेलू स्तर पर खपत में कमी लाने की रही।

खपत में कटौती और वैकल्पिक ऊर्जा का मजबूत विकल्प

बीजिंग ने न केवल आयात पर नियंत्रण किया, बल्कि अपनी घरेलू तेल खपत को भी आक्रामक तरीके से घटाया। हालिया तिमाहियों में चीन ने अपने दैनिक उपभोग में प्रतिदिन 15 लाख बैरल तक की कमी दर्ज की, जो पूरी दुनिया की कुल तेल मांग में 1 फीसदी से अधिक की सीधी गिरावट के बराबर है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के आंकड़ों के मुताबिक, चीन में पैसेंजर कारों के बाजार में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की हिस्सेदारी तेजी से बढ़कर 14 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। इसके अलावा देश में फैला विशाल हाई-स्पीड इलेक्ट्रिक रेल नेटवर्क, कोयले से रसायन बनाने की अत्याधुनिक ‘कोल-टू-केमिकल’ तकनीक और सौर ऊर्जा का रिकॉर्ड उत्पादन चीन को एक ऐसा मजबूत आधार देता है, जो पश्चिमी देशों के पास नहीं है।

 

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