नई दिल्ली। भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता को नए दौर की जंग के मुताबिक और अधिक घातक बनाने की दिशा में रक्षा मंत्रालय ने एक बेहद अहम और बड़ा कदम उठाया है। वायुसेना की लंबी दूरी की सटीक प्रहार क्षमता (Long Range Precision Strike) को अभेद्य धार देने के लिए 160 सैटेलाइट-गाइडेड स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन (SAAW) की खरीद को अंतिम रूप दे दिया गया है। करीब 811 करोड़ रुपये के इस रणनीतिक सौदे पर सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख रक्षा कंपनी भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) के साथ अनुबंध पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
यह संपूर्ण खरीद ‘बाय इंडियन-आईडीडीएम’ (स्वदेशी रूप से डिजाइन, विकसित और निर्मित) श्रेणी के तहत की जा रही है। इस आधुनिक हथियार को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक के आधार पर डिजाइन और विकसित किया है। यह हवा से जमीन पर मार करने वाला एक बेहद परिष्कृत प्रिसिजन ग्लाइड बम है, जिसे लड़ाकू जेट से सुरक्षित दूरी बनाकर दागा जा सकता है। इसका प्राथमिक मकसद विरोधी सेना के हवाई रनवे, एयरफील्ड, रडार प्रतिष्ठानों और सामरिक बंकरों को पूरी तरह ध्वस्त करना है। रक्षा हलकों में इसे मारक क्षमता के लिहाज से ब्रह्मोस से भी अधिक सटीक और घातक माना जाता है, जिसने ऐतिहासिक ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सीमा पार पाकिस्तानी एयरबेस के बुनियादी ढांचे को तहस-नहस करने में अपनी ताकत साबित की थी।
ग्लाइड तकनीक से बदलेगा युद्ध का समीकरण
इस आधुनिक अस्त्र की सबसे बड़ी खूबी इसका एडवांस ग्लाइडिंग मैकेनिज्म है। सामान्य पारंपरिक बमों की तरह इसे गिराने के लिए लड़ाकू विमान को दुश्मन के एयर डिफेंस जोन या रडार की परिधि में जाने की बिल्कुल जरूरत नहीं पड़ती। फाइटर जेट इसे अपने सुरक्षित हवाई क्षेत्र से ही रिलीज कर सकता है, जिसके बाद यह हवा में तैरते (ग्लाइड करते) हुए लंबी दूरी तय कर सीधे लक्षित बिंदु पर अचूक प्रहार करता है। जंग के मैदान में वायुसेना के लिए यह ‘स्टैंड-ऑफ’ क्षमता रणनीतिक बढ़त की गारंटी मानी जाती है, जिससे पायलट और विमान दोनों दुश्मन की मिसाइल रेंज से पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं।
सुखोई, जगुआर और हॉक बनेंगे और भी विध्वंसक
भारतीय वायुसेना ने इस गाइडेड हथियार को अपने मुख्य स्ट्राइक फाइटर जेट्स के बेड़े में शामिल करने के लिए पूरी तरह अनुकूलित किया है। इसे फ्रंटलाइन फाइटर सुखोई-30एमकेआई (Su-30MKI), जगुआर और हॉक जैसे उन्नत विमानों से फायर करने के लिए तैनात किया जा रहा है। Su-30MKI पहले से ही भारतीय वायुसेना की रीढ़ है और अलग-अलग प्रकार के आधुनिक हथियारों के एकीकरण के साथ यह दुनिया के सबसे मारक विमानों में गिना जाता है। इस नए ग्लाइड वेपन के जुड़ने से वायुसेना को दुश्मन के सैन्य ठिकानों पर सैकड़ों किलोमीटर दूर से पिन-पॉइंट स्ट्राइक करने का एक नया और शक्तिशाली विकल्प मिल जाएगा।
60 फीसदी स्वदेशी कलपुर्जे, 2027 से शुरू होगी डिलीवरी
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, इस पूरी हथियार प्रणाली में करीब 60 प्रतिशत सामग्री और कलपुर्जे पूरी तरह स्वदेशी होंगे। मिसाइल और बम प्रणाली के ज्यादातर जटिल सब-सिस्टम का निर्माण घरेलू स्तर पर किया जाएगा, जो देश के रक्षा विनिर्माण और तकनीकी आत्मनिर्भरता को नई गति देगा। अनुबंध की शर्तों के अनुसार, हथियारों की नियमित आपूर्ति वित्त वर्ष 2027-28 और 2028-29 के बीच चरणबद्ध तरीके से पूरी की जाएगी। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत तैयार यह परियोजना भारतीय वायुसेना को बिना सीमा पार किए दुश्मन के महत्वपूर्ण और स्थिर ठिकानों को नेस्तनाबूद करने की असीम ताकत देगी।
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