
नई दिल्ली ब्यूरो। हर साल की तरह इस बार भी सर्दियों की दस्तक के साथ ही राजधानी दिल्ली और एनसीआर की आबोहवा में जहर घुलना शुरू हो चुका है। घरों से बाहर निकलते ही आंखों में तीखी जलन, गले में खराश, सांस लेने में तकलीफ और आसमान में धुंध (Smog) की मोटी चादर रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई है। अमूमन हर बार दीवाली से पहले प्रदूषण का ठीकरा केवल पटाखों या पड़ोसी राज्यों में जलने वाली पराली पर फोड़ दिया जाता है। लेकिन बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या राजधानी की दमघोंटू हवा के पीछे सिर्फ यही दो वजहें हैं?
इस बहस को सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों ने एक बार फिर नई दिशा दी है। शीर्ष अदालत ने माना है कि पटाखों से प्रदूषण जरूर होता है, लेकिन पूरी दिल्ली की जहरीली हवा के लिए सिर्फ इन्हें कसूरवार नहीं ठहराया जा सकता। खासकर तब, जब साल 2024 में पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) में कोई खास सुधार दर्ज नहीं हुआ था।
‘सिर्फ बैन लगाना हल नहीं’, सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि पटाखों पर पूर्ण रोक लगाना देखने में एक सीधा समाधान लग सकता है, लेकिन ऐसा कोई पुख्ता वैज्ञानिक डेटा मौजूद नहीं है जो यह साबित करे कि केवल प्रतिबंध से दिल्ली का वायु संकट खत्म हो जाएगा। कोर्ट ने 2024 के अनुभवों का हवाला देते हुए रेखांकित किया कि संपूर्ण प्रतिबंध के बाद भी हवा की गुणवत्ता जस की तस बनी रही।
कोर्ट ने साफ किया कि संविधान का अनुच्छेद 21 नागरिकों को स्वच्छ वातावरण में जीने का अधिकार देता है और किसी भी धार्मिक आजादी के नाम पर लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। अदालत ने नियमों की कागजी कार्रवाई के बजाय जमीनी स्तर पर सख्त निगरानी की जरूरत बताई। इसी के मद्देनजर कोर्ट ने 7 और 8 नवंबर 2026 को कड़ी शर्तों के साथ सिर्फ सर्टिफाइड ग्रीन पटाखे जलाने की सीमित छूट दी है, जिसके बाद 9 नवंबर से दोबारा सालभर के लिए प्रतिबंध प्रभावी रहेगा। राज्यों को दिवाली के बाद AQI और अस्पतालों में सांस के मरीजों के आंकड़े कोर्ट में पेश करने होंगे, जिस पर अगली सुनवाई 16 दिसंबर 2026 को तय की गई है।
संसद में पेश CAQM रिपोर्ट: सर्दियों में PM2.5 के ये हैं 5 सबसे बड़े गुनहगार
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा संसद में पेश कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (CAQM) के आंकड़ों ने दिल्ली की हवा खराब करने वाले असल कारकों की पोल खोल दी है। रिपोर्ट के अनुसार, सर्दियों के दौरान हवा में घुलने वाले घातक PM2.5 कणों के प्रमुख स्रोत इस प्रकार हैं:
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हवा में बनने वाले सेकंडरी पार्टिकल्स (24 से 28%): विभिन्न गैसीय प्रदूषकों (सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड आदि) के वायुमंडल में रासायनिक मेल से बनने वाले अति सूक्ष्म कण प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण हैं।
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वाहनों का धुआं (19 से 24%): दिल्ली-एनसीआर की सड़कों पर दौड़ने वाले लाखों पेट्रोल-डीजल वाहनों से निकलने वाले धुएं का हिस्सा करीब एक-चौथाई है। भारी ट्रैफिक जाम और पुराने इंजनों से निकलने वाली जहरीली गैसें हवा को जहरीला बना रही हैं।
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बायोमास और कूड़ा जलाना (17 से 23%): सर्दियों में पंजाब-हरियाणा की पराली के अलावा दिल्ली में लैंडफिल साइट्स पर आग, सड़कों किनारे कूड़ा जलाना और ठंड से बचने के लिए घरेलू स्तर पर जलाई जाने वाली लकड़ियों का धुआं इसमें शामिल है।
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सड़क और निर्माण कार्यों की धूल (10 से 18%): इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, बिल्डिंग निर्माण, खुदाई और सड़कों पर उड़ने वाली धूल से निकलने वाले डस्ट पार्टिकल्स पीएम स्तर को खतरनाक श्रेणी में पहुंचाते हैं।
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उद्योग और थर्मल पावर प्लांट (8 से 10%): दिल्ली के आसपास चल रहे औद्योगिक कारखानों और बिजली उत्पादन संयंत्रों से निकलने वाले धुएं का योगदान भी सर्दियों में बढ़ जाता है।
‘तापमान उलटाव’: सर्दियों में क्यों थम जाता है जहर?
दिल्ली का भौगोलिक और मौसमी ढांचा सर्दियों में इस संकट को कई गुना बढ़ा देता है। सर्दियों में चलने वाली हवाओं की रफ्तार बेहद धीमी हो जाती है। इसके साथ ही ‘तापमान उलटाव’ (Temperature Inversion) की मौसमी परिघटना होती है, जहां ठंडी और भारी हवा जमीन के करीब कैद हो जाती है और ऊपर की गर्म हवा उसे ऊपर उठने से रोक देती है। इसके चलते धुएं, धूल और रसायनों से मिलकर बना स्मॉग शहर के ऊपर एक स्थिर गुंबद की तरह जम जाता है, जिससे प्रदूषण कई दिनों तक छंट नहीं पाता।
सरकार के दावे: हवा सुधारने के लिए क्या हुए उपाय?
केंद्र सरकार ने सदन को बताया कि दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की रोकथाम के लिए गठित सीएक्यूएम (CAQM) अब तक 101 वैधानिक निर्देश और 17 अहम दिशा-निर्देश जारी कर चुका है। इन निर्देशों में धूल नियंत्रण, औद्योगिक ईंधन में बदलाव और पराली प्रबंधन से जुड़ी नीतियां शामिल हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली में वायु गुणवत्ता में सुधार के संकेत भी दिखे हैं। वर्ष 2016 में जहां 200 से कम एक्यूआई (संतोषजनक हवा) वाले दिन मात्र 110 थे, वहीं 2025 में ऐसे दिनों की संख्या बढ़कर 200 दिन तक पहुंच गई। इसके अलावा, हवा में PM10 का वार्षिक औसत स्तर 2016 के 290 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से घटकर 2025 में 197 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया है। हालांकि, सर्दियों के इन दो महीनों में स्थिति अभी भी आपातकालीन बनी हुई है।
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