Monday , 2 November 2026

बिहार सरकार का बड़ा फैसला: अब बच्चों के दरवाजे पर चलकर आएगा स्कूल, बेकार पड़ी बसें बनेंगी स्मार्ट क्लासरूम; मुफ्त मिलेगा खाना और ड्रेस

पटना: गरीबी, दूरी या पारिवारिक मजबूरियों के चलते शिक्षा से वंचित रह जाने वाले नौनिहालों के लिए बिहार सरकार एक अनूठी सौगात लेकर आई है। राज्य सरकार एक बेहद महत्वाकांक्षी और संवेदनशील पहल शुरू करने जा रही है, जिसे नाम दिया गया है—’स्कूल ऑन व्हील्स’ (School on Wheels) यानी ‘चक्के पर स्कूल’। इस योजना के तहत वर्षों से निष्प्रयोज्य और बेकार खड़ी बड़ी-बड़ी सरकारी बसों को आधुनिक, खूबसूरत और चलते-फिरते क्लासरूम में तब्दील किया जाएगा। ये बसें खुद चलकर उन झुग्गी-झोपड़ियों, मलिन बस्तियों और सुदूर देहाती इलाकों तक पहुंचेंगी, जहां के बच्चे कभी स्कूल की चौखट नहीं देख पाते। आइए जानते हैं कि इस चलते-फिरते स्कूल में बच्चों को क्या सहूलियतें मिलेंगी और किन-किन जिलों से इसका आगाज हो रहा है।

स्मार्ट स्क्रीन से लेकर वाई-फाई और डिजिटल क्लास की आधुनिक व्यवस्था

यह चलती-फिरती बस महज औपचारिकता पूरी करने नहीं जाएगी, बल्कि बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि जगाने के लिए इसे पूरी तरह आधुनिक सुविधाओं से लैस किया जाएगा। बस के भीतर वाई-फाई कनेक्टिविटी, डिजिटल लर्निंग टूल्स और स्मार्ट स्क्रीन लगाए जाएंगे ताकि खेल-खेल में आधुनिक तकनीक के जरिए बच्चों को अक्षर ज्ञान और प्राथमिक शिक्षा दी जा सके।

गरमा-गरम मिड डे मील, मुफ्त कॉपियां-किताबें और यूनिफॉर्म भी

आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवारों के बच्चों को पढ़ाई की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सरकार कई अतिरिक्त सुविधाएं भी मुहैया कराएगी। कक्षा में आने वाले हर बच्चे को दोपहर का ताजा, पौष्टिक और गरमा-गरम खाना (मिड डे मील) पूरी तरह मुफ्त दिया जाएगा। इसके अलावा, अभिभावकों की जेब पर कोई बोझ न पड़े, इसके लिए बच्चों को मुफ्त स्कूल बैग, ड्रेस, कॉपियां और किताबें भी दी जाएंगी।

पहले चरण में पटना समेत इन पांच प्रमुख जिलों का हुआ चयन

राज्य सरकार इस महत्वाकांक्षी योजना को शुरुआती चरण में बिहार के पांच बड़े जिलों में शुरू करने जा रही है। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकार (नालसा) की पहल पर इसके लिए राजधानी पटना के साथ-साथ भागलपुर, मुजफ्फरपुर, गया और दरभंगा जिले का चयन किया गया है। इन सभी जिलों में चिह्निंत बस्तियों और रूटों पर इन बसों का नियमित संचालन किया जाएगा।

चार प्रमुख विभागों के जिम्मे होगी कमान, नगर निगम रखेगा पूरी निगरानी

प्रोजेक्ट को पारदर्शी और असरदार तरीके से लागू करने के लिए चार विभाग संयुक्त रूप से मोर्चा संभालेंगे। इसमें विधि विभाग, शिक्षा विभाग, नगर निगम और जिला प्रशासन (कलेक्टर कार्यालय) आपसी तालमेल से काम करेंगे। स्थानीय नगर निगम को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वह बच्चों की दैनिक उपस्थिति (अटेंडेंस) का ब्योरा रखे और यह सुनिश्चित करे कि दी जा रही शिक्षा की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप हो।

ट्रैफिक सिग्नल पर सामान बेचने वाले और ड्रॉपआउट बच्चों को मिलेगा प्रवेश

‘स्कूल ऑन व्हील्स’ में मुख्य रूप से 6 से 14 वर्ष की आयु वर्ग के उन बच्चों को प्राथमिकता के आधार पर दाखिला दिया जाएगा जो ट्रैफिक सिग्नल पर सामान बेचते हैं, भीख मांगते हैं, फुटपाथ या सड़क किनारे झुग्गियों में रहते हैं अथवा अनाथ हैं। इसके साथ ही उन ड्रॉपआउट बच्चों को भी दोबारा कक्षा से जोड़ा जाएगा जिन्होंने किसी मजबूरी के चलते अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी। एडमिशन प्रक्रिया शुरू करने से पहले बच्चों के माता-पिता या अभिभावकों की औपचारिक सहमति ली जाएगी। इस बस में बच्चों की बुनियादी नींव को इतना मजबूत किया जाएगा ताकि वे तय समय बाद अपनी उम्र के हिसाब से किसी भी नियमित सरकारी विद्यालय में सामान्य दाखिला ले सकें।

महाराष्ट्र, गुजरात और असम के बाद अब बिहार में भी अनूठा मॉडल

भारत के चुनिंदा राज्यों में इस तरह के नवाचार पहले से सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, केरल, असम और मणिपुर के बाद अब बिहार भी इस सूची में शामिल होने जा रहा है, जिससे वंचित वर्ग के हजारों मासूमों का भविष्य संवरने की उम्मीद जगी है।

 

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