
यरुशलम/नई दिल्ली: इजरायल के आम चुनाव में आए रुझानों ने मुल्क की राजनीति में हलचल मचा दी है। मतगणना के ताज़ा आंकड़ों में देश के दो बड़े अरब राजनीतिक समूहों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए करीब 19 सीटों पर मजबूत बढ़त बना ली है। यह आंकड़ा इजरायली संसद (नेसेट) में उनकी मौजूदा संख्या से लगभग दोगुना है। 120 सीटों वाली संसद में किसी भी बड़े गुट को अपने दम पर स्पष्ट बहुमत (61 सीटें) न मिलने की स्थिति में अब नई सरकार के गठन में अरब पार्टियां निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।
जॉइंट लिस्ट और ‘राआम’ की बड़ी छलांग
चुनावी रुझानों के अनुसार, यूसुफ जबरीन के नेतृत्व वाले ‘जॉइंट लिस्ट’ गठबंधन और मंसूर अब्बास की अगुवाई वाली ‘राआम’ (Ra’am) पार्टी ने जोरदार प्रदर्शन किया है। अनुमानों के मुताबिक, अकेले जॉइंट लिस्ट को लगभग 12 सीटें मिलने की उम्मीद है। दोनों दलों की संभावित 19 सीटें इजरायल के चुनावी इतिहास में अरब समुदाय के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक ध्रुवीकरण की ओर इशारा कर रही हैं।
सरकार को बाहर से समर्थन देने को तैयार जबरीन, रखीं शर्तें
जॉइंट लिस्ट के प्रमुख यूसुफ जबरीन ने स्पष्ट संकेत दिया है कि उनकी पार्टी इस जनादेश का उपयोग बेंजामिन नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करने के लिए करेगी। हालांकि, उन्होंने साफ किया कि वे सरकार के सीधे हिस्सेदार नहीं बनेंगे। जबरीन ने कहा कि वे गाजा सैन्य अभियान और दक्षिणी लेबनान पर कब्जे जैसे मसलों पर गाड़ी आइजनकोट के रुख से इत्तेफाक नहीं रखते, लेकिन वे वैकल्पिक सरकार को ‘बाहर से समर्थन’ (Safety Net) देने के लिए तैयार हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी प्राथमिक शर्त अरब नागरिकों के नागरिक अधिकारों की सुरक्षा और देश में पूर्ण समानता सुनिश्चित करना है।
मंसूर अब्बास ने दिए सीधे गठबंधन के संकेत
दूसरी ओर, राआम पार्टी के नेता मंसूर अब्बास सरकार में सीधे तौर पर शामिल होने के लिए रास्ते तलाश रहे हैं। व्यावहारिक राजनीति के लिए जाने जाने वाले 52 वर्षीय दंत चिकित्सक और सांसद अब्बास ने अपनी पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए अपनी सूची में एक यहूदी पूर्व पुलिस अधिकारी को भी मैदान में उतारा था। अब्बास का दावा है कि चुनाव से पहले ही आइजनकोट खेमे के शीर्ष नेताओं के साथ संभावित समझौते पर चर्चा हुई थी, और दक्षिणपंथी खेमे के भी एक बड़े नेता ने उनसे संपर्क साधा था।
नेतन्याहू और आइजनकोट दोनों ने बनाई दूरी, राह आसान नहीं
अरब दलों के किंगमेकर बनकर उभरने के बावजूद सत्ता का गणित उलझा हुआ है। प्रचार अभियान के दौरान विपक्षी नेता गादी आइजनकोट ने स्पष्ट कहा था कि साझा लोकतांत्रिक और यहूदी मूल्यों के अभाव के कारण वे अरब दलों के साथ सरकार नहीं बनाएंगे। वहीं, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने भी दोहराया है कि वह सरकार गठन को लेकर अरब दलों के साथ किसी भी तरह की बातचीत नहीं करेगी।
20 फीसदी आबादी, संसद में ऐतिहासिक असर
इजरायल की कुल जनसंख्या में लगभग 21 लाख (करीब 20%) अरब नागरिक हैं। स्वास्थ्य सेवाओं में देश के 20 फीसदी से अधिक डॉक्टर और 25 फीसदी से ज्यादा नर्सें इसी समुदाय से आती हैं। गौरतलब है कि 2021 में नफ्ताली बेनेट और यायर लापिड के कार्यकाल में मंसूर अब्बास की राआम पार्टी पहली बार सरकार में शामिल हुई थी। अब एक बार फिर जब इजरायली संसद में सत्ता की चाबी इन्हीं दलों के हाथों में जाती दिख रही है, तो देखना होगा कि नेतन्याहू और आइजनकोट अपनी पूर्व घोषणाओं पर कायम रहते हैं या सियासी मजबूरी नया समीकरण गढ़ती है।
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