Tuesday , 22 September 2026

अमेरिका में टूटा ‘अमेरिकन ड्रीम’: H-1B वीजा नियमों की सख्ती से भारतीय पेशेवरों का पलायन, ब्रिटेन-जर्मनी बने नई पसंद

संयुक्त राज्य अमेरिका में एच-1बी वीजा नियमों को लेकर बढ़ती सख्ती और लगातार बदलती नीतियों ने भारतीय उच्च कुशल पेशेवरों और शोधकर्ताओं के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल खड़े कर दिए हैं। बीते एक वर्ष के दौरान वीजा शुल्क में भारी वृद्धि और प्रक्रियात्मक जटिलताओं के चलते भारतीय प्रतिभाओं का मोहभंग होने लगा है। बेहतर कॅरिअर और स्थिरता की तलाश में अब यह प्रतिभा पूल अमेरिका छोड़कर जर्मनी और ब्रिटेन जैसे यूरोपीय देशों की ओर रुख कर रहा है, जबकि कई पेशेवर अब सीधे भारत लौटने की तैयारी में हैं।

तीन दशक का रिकॉर्ड टूटा, 29 फीसदी शोधकर्ताओं ने छोड़ा अमेरिका

अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिक्स के ताजा आंकड़ों ने अमेरिकी शोध और उच्च शिक्षा क्षेत्र की चिंता बढ़ा दी है। आंकड़ों के मुताबिक, भौतिकी (फिजिक्स) में पीएचडी करने वाले विदेशी स्कॉलर्स के अमेरिका छोड़ने की दर वर्ष 2023-24 में 16 प्रतिशत थी, जो वर्ष 2024-25 में उछलकर सीधे 29 प्रतिशत पर पहुंच गई। बीते तीन दशकों में किसी एक वर्ष में पलायन की यह सबसे बड़ी छलांग है। इसके साथ ही करीब 60 प्रतिशत अमेरिकी विश्वविद्यालयों में विदेशी छात्रों के दाखिला आवेदनों में गिरावट दर्ज की गई है। चालू वित्त वर्ष के शुरुआती नौ महीनों में ही वीजा आवेदनों में 10 प्रतिशत की भारी कमी आई है।

सपनों की जिंदगी से निर्वासन तक: पेशेवरों की आपबीती

अमेरिकी मीडिया आउटलेट बिजनेस इनसाइडर की एक पड़ताल से खुलासा हुआ है कि वहां बरसों से बसे भारतीयों के लिए सुनहरे भविष्य का सपना अब पलायन के दर्द में तब्दील हो चुका है। शिकागो में कार्यरत भारतीय वैज्ञानिक अनन्या जोशी इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं; नियोक्ता कंपनी द्वारा एच-1बी स्पॉन्सरशिप से हाथ खड़े करने के बाद उन्हें अमेरिका छोड़कर जर्मनी जाना पड़ा। इसी तरह प्रतिष्ठित कोलंबिया यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातकोत्तर सुंजना रमना तीन बार प्रयास के बावजूद एच-1बी वीजा हासिल नहीं कर सकीं। अंततः उन्होंने ब्रिटेन का ‘हाई-पोटेंशियल वीजा’ हासिल किया और लंदन की एक फिनटेक कंपनी में अपनी नई राह बनाई। सुंजना का कहना है कि सपनों को किसी भौगोलिक सीमा में बांधने के बजाय अपनी क्षमताओं और पेशेवर लक्ष्यों पर भरोसा करना ज्यादा बेहतर है।

H-1B में भारतीय सबसे आगे, अमेरिकी विज्ञान और इंजीनियरिंग की रीढ़

अमेरिका के तकनीकी ढांचे में विदेशी श्रमबल, विशेषकर भारतीयों की हिस्सेदारी बेहद निर्णायक है। आंकड़ों के अनुसार, कुल एच-1बी वीजा लाभार्थियों में भारत की हिस्सेदारी सबसे अधिक 69.9 प्रतिशत (2,83,772 लाभार्थी) है, जबकि चीन 12.1 प्रतिशत (49,161 लाभार्थी) के साथ दूसरे और अन्य देश 18 प्रतिशत पर हैं। नेशनल साइंस फाउंडेशन के आंकड़े बताते हैं कि अमेरिकी साइंस और इंजीनियरिंग कार्यबल में 22 प्रतिशत विदेशी मूल के हैं। इनमें मास्टर डिग्री धारकों में 39 प्रतिशत और पीएचडी धारक वैज्ञानिकों में 46 प्रतिशत हिस्सेदारी विदेशी पेशेवरों की है। एच-1बी आवेदनों के वर्गीकरण को देखें तो 44.5 प्रतिशत पेशेवर-तकनीकी सेवाओं से, 12.1 प्रतिशत मैन्युफैक्चरिंग से, 9.9 प्रतिशत आईटी और 9.0 प्रतिशत फाइनेंस क्षेत्र से आते हैं।

एक लाख डॉलर शुल्क और नीतिगत गतिरोध से अफरातफरी

ट्रंप प्रशासन द्वारा पिछले वर्ष 20 सितंबर को एच-1बी वीजा शुल्क को बढ़ाकर एक लाख डॉलर करने के फैसले ने कंपनियों और कर्मचारियों के बीच भारी भ्रम पैदा कर दिया था। हालांकि बाद में न्यायिक प्रक्रिया के चलते इस भारी-भरकम शुल्क के क्रियान्वयन पर कानूनी रोक लगा दी गई, लेकिन सितंबर 2026 में ट्रंप प्रशासन ने इस नीतिगत रुख को एक और साल के लिए आगे बढ़ा दिया है। माइग्रेशन पॉलिसी इंस्टीट्यूट के अनुसार, बीते दो दशकों में विदेशी प्रतिभाओं का ऐसा अभूतपूर्व पलायन कभी नहीं देखा गया और शीर्ष शोधकर्ताओं को अमेरिका से जोड़ने वाली व्यवस्था अब योजनाबद्ध ढंग से कमजोर पड़ती जा रही है।

‘रिवर्स ब्रेन ड्रेन’: भारत के स्टार्टअप और टेक सेक्टर को होगा सीधा फायदा

अमेरिका में उपजे इस अनिश्चित माहौल का सकारात्मक पहलू यह है कि इससे भारत के घरेलू तकनीकी तंत्र को बड़ा संबल मिल सकता है। शीर्ष स्तर के भारतीय वैज्ञानिक, इंजीनियर और सॉफ्टवेयर विशेषज्ञ अब स्वदेश लौटकर स्टार्टअप्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), डीप-टेक और अनुसंधान क्षेत्रों में नए आयाम स्थापित कर सकते हैं। देश में बढ़ते डिजिटल बुनियादी ढांचे और उद्यमिता के अनुकूल माहौल के बीच यह प्रतिभा वापसी भारत के आर्थिक और तकनीकी विकास को नई रफ्तार देने में सक्षम साबित होगी।

 

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