
वॉशिंगटन/नई दिल्ली: अमेरिकी टेक जगत और सिलिकॉन वैली में काम कर रहे विदेशी पेशेवरों के लिए 8 अक्टूबर का दिन बड़ा झटका साबित हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने वर्क वीजा नियमों के कथित दुरुपयोग को लेकर कई शीर्ष तकनीकी कंपनियों के लिए परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम (PERM) को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। इस कड़े फैसले की जद में अमेरिकी दिग्गज माइक्रोसॉफ्ट के साथ-साथ टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), इंफोसिस, विप्रो, एचसीएल, कॉग्निजेंट और कैपजेमिनी जैसी प्रमुख भारतीय आईटी कंपनियां भी शामिल हैं। प्रशासन की इस कार्रवाई के बाद से इन कंपनियों में कार्यरत लाखों भारतीय इंजीनियरों और आईटी प्रोफेशनल्स के भविष्य पर असमंजस के बादल मंडराने लगे हैं।
क्या है PERM प्रोग्राम और क्यों है यह इतना महत्वपूर्ण? पूरे विवाद की जड़ को समझने के लिए परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम (PERM) की भूमिका को जानना जरूरी है। यह अमेरिकी श्रम विभाग (DOL) द्वारा संचालित एक आधिकारिक और अनिवार्य प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से कोई भी अमेरिकी नियोक्ता अपने विदेशी कर्मचारी को स्थायी निवास यानी रोजगार आधारित ‘ग्रीन कार्ड’ दिलाने के लिए स्पॉन्सर करता है। नियम के तहत कंपनी को श्रम विभाग के समक्ष यह प्रमाणित करना पड़ता है कि जिस पद पर विदेशी पेशेवर को रखा जा रहा है, उसके लिए योग्य, इच्छुक और सक्षम स्थानीय अमेरिकी नागरिक उपलब्ध नहीं है। अब ट्रंप प्रशासन द्वारा इस प्रक्रिया को निलंबित किए जाने का सीधा अर्थ यह है कि संबंधित कंपनियां अपने विदेशी कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड की नई अर्जी दाखिल करने की प्रक्रिया शुरू नहीं कर सकेंगी।
माइक्रोसॉफ्ट पर जेडी वेंस का तीखा हमला, अन्य टेक दिग्गज भी लपेटे में इस फैसले की घोषणा के दौरान वॉशिंगटन में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमेरिकी सरकार के तेवर बेहद सख्त रहे। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सीधे तौर पर माइक्रोसॉफ्ट को कटघरे में खड़ा करते हुए आरोप लगाया कि देश के इतिहास में शायद ही किसी कंपनी ने वीजा व्यवस्था का इतना दुरुपयोग किया हो जितना माइक्रोसॉफ्ट ने किया है। वेंस ने कहा कि उनका उद्देश्य कंपनियों को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि स्थानीय अमेरिकी नागरिकों के रोजगार हितों की रक्षा करना है। वहीं अमेरिकी श्रम मंत्री कीथ सोंडरलिंग ने स्पष्ट किया कि कार्रवाई केवल माइक्रोसॉफ्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि इंफोसिस, विप्रो, टाटा, एचसीएल, कॉग्निजेंट और कैपजेमिनी के लिए भी PERM प्रोग्राम को सस्पेंड किया गया है। सोंडरलिंग ने कड़े शब्दों में कहा कि प्रशासन समस्या की जड़ तक पहुंच चुका है और इन सभी कंपनियों के खिलाफ गहन जांच की जा रही है।
भारतीय प्रोफेशनल्स पर सीधा असर और बैकलाग का संकट इस फैसले की सबसे बड़ी मार अमेरिका में काम कर रहे भारतीय तकनीकी कार्यबल पर पड़ने की आशंका है, क्योंकि टॉप आईटी कंपनियों में भारतीय इंजीनियरों की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। भारतीय पेशेवर पहले से ही ग्रीन कार्ड के दशकों लंबे इंतजार और प्रति-देश कोटा (Country Cap) की पाबंदियों से जूझ रहे हैं। अमेरिकी विदेश विभाग के सितंबर 2026 के वीजा बुलेटिन के अनुसार, भारत के लिए EB-2 कैटेगरी फाइनल एक्शन के लिए पूरी तरह अनुपलब्ध थी, जबकि EB-3 कैटेगरी की कट-ऑफ तारीख 1 जनवरी 2014 पर ही रुकी हुई थी। ऐसे जटिल परिदृश्य में लेबर सर्टिफिकेशन पर रोक लगने से नए भारतीय आवेदकों का स्थायी निवास का इंतजार और लंबा खिंच जाएगा।
6 साल की H-1B मियाद वाले कर्मचारियों के सामने अमेरिका छोड़ने की नौबत इस निलंबन का सबसे गंभीर असर उन H-1B वीजा धारकों पर पड़ने वाला है जो अपने 6 साल के अधिकतम प्रवास काल के अंतिम पड़ाव पर हैं। अमेरिकी आव्रजन नियमों के अनुसार, H-1B वीजा पर कोई भी कर्मचारी अधिकतम छह वर्ष तक ही काम कर सकता है। छह साल से अधिक का विस्तार केवल उन्हीं परिस्थितियों में मिलता है, जब कर्मचारी का PERM आवेदन समय सीमा समाप्त होने से कम से कम एक वर्ष पहले दाखिल हो चुका हो या I-140 स्वीकृत हो। अब कंपनियों पर लगी रोक के कारण नया PERM दाखिल न होने से इन कर्मचारियों को वीजा एक्सटेंशन नहीं मिल सकेगा और उन्हें अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है। हालांकि, जिन प्रोफेशनल्स की I-140 याचिकाएं पहले ही स्वीकृत हो चुकी हैं और वे केवल प्राथमिकता तिथि (Priority Date) का इंतजार कर रहे हैं, उन्हें मौजूदा नियमों के तहत तीन-तीन साल के एक्सटेंशन की सुविधा मिलती रहेगी।
voice of india