Friday , 2 October 2026

‘एक कचौड़ी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा?’ दिल्ली की सड़कों पर गूंजे व्यंग्यात्मक नारे, छात्राओं ने सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक उठाई सुरक्षा और आजादी की आवाज

नई दिल्ली देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों एक ऐसा नारा गूंज रहा है, जो सुनने में भले ही तुकबंदी जैसा हल्का-फुल्का लगे, लेकिन इसके गर्भ में छिपा सवाल व्यवस्था और समाज की रूह को झकझोर देने वाला है— ‘एक कचौड़ी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा?’ दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) समेत राजधानी के प्रतिष्ठित कॉलेजों की छात्राएं अब पारंपरिक प्रदर्शनों के ढर्रे को तोड़कर व्यंग्य, चुटीले नारों और सोशल मीडिया की सशक्त जुबान के जरिए महिला सुरक्षा, सार्वजनिक स्थानों पर आजादी और हर पल पीछा करते डर के खिलाफ मुखर हो गई हैं।

आस्था कुंज पार्क कांड के बाद फूटा छात्राओं का आक्रोश

इस व्यापक विरोध प्रदर्शन की ताजा चिंगारी दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में 21 सितंबर 2026 को 17 वर्षीय किशोरी के साथ हुए कथित सामूहिक दुष्कर्म की वारदात के बाद भड़की। पुलिस जांच के अनुसार, आरोपियों ने खुद को पुलिसकर्मी बताकर किशोरी और उसके साथी को पहले धमकाया और फिर संगीन जुर्म को अंजाम दिया। मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया और पॉक्सो (POCSO) व भारतीय न्याय संहिता की सख्त धाराओं के तहत जेल भेजा, जहां शिनाख्त परेड में पीड़िता ने तीनों की पहचान भी कर ली। चूंकि यह पार्क लेडी श्रीराम (LSR) कॉलेज से महज दो किलोमीटर के दायरे में स्थित है, इसलिए छात्र समुदाय में यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि यदि प्रमुख शिक्षण संस्थानों के आसपास ही बेटियां महफूज नहीं हैं, तो राजधानी के किस कोने पर भरोसा किया जाए।

व्यंग्य में छिपा कड़ा सवाल: सुरक्षा के नाम पर पहरा लड़कियों पर क्यों?

‘हम औरतें आजाद हैं’, ‘रातों पर भी हक है हमारा’ और ‘रैपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं’ जैसी तख्तियों के साथ छात्राओं ने साफ संदेश दिया है कि सुरक्षा का मतलब उनकी आवाजाही पर पाबंदियां लगाना या हॉस्टल के ताले जल्दी बंद करना नहीं है। हाल ही में हिंदू कॉलेज की दो छात्राओं के साथ हुई बदसलूकी, अश्लील फब्तियां कसने और उन्हें गाड़ी में खींचने की कोशिश जैसी घटना ने इस गुस्से में घी डालने का काम किया। छात्राओं का कहना है कि बात केवल किसी एक घटना की नहीं, बल्कि अंधेरी सड़कों, खराब स्ट्रीट लाइटों, सुनसान बस स्टैंडों और पब्लिक ट्रांसपोर्ट में हर दिन झेले जाने वाले उस डर की है, जो उनकी दिनचर्या को सीमित कर देता है।

20 दिनों में रेप के 13 मामले, सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान

दिल्ली-एनसीआर में सितंबर महीने के भीतर ही महिलाओं व बच्चियों के खिलाफ दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न के कम से कम 13 गंभीर मामले सामने आने पर देश की सर्वोच्च अदालत ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्वत: संज्ञान लिया है। आस्था कुंज पार्क की घटना और चलती स्लीपर बस में नाबालिग से दरिंदगी जैसे मामलों को रेखांकित करते हुए अदालत ने साफ निर्देश दिए कि पार्क, सड़कें, बसें और मेट्रो स्टेशन जैसी सार्वजनिक जगहें केवल सीसीटीवी की कमी, खराब रोशनी या लचर पुलिस गश्त की वजह से अपराध का अड्डा नहीं बन सकतीं। कोर्ट ने निगरानी तंत्र को दुरुस्त करने और प्रशासनिक जवाबदेही तय करने पर कड़ा रुख अपनाया है। वहीं, उपराज्यपाल ने भी महिला कॉलेजों के आसपास अंधेरे डार्क स्पॉट्स, अंतिम छोर तक सुरक्षित परिवहन और पार्कों की सुरक्षा को लेकर आपात बैठकें बुलाई हैं।

अपराध के आंकड़े: अनजान से ज्यादा अपनों से खतरा

एनसीआरबी (NCRB) के आंकड़े यह चौंकाने वाली सच्चाई सामने लाते हैं कि महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ होने वाली हिंसा का खतरा सिर्फ अनजान चेहरों से नहीं होता। 2024 के आंकड़ों के अनुसार, नाबालिग लड़कियों से जुड़े करीब 97 फीसदी दुष्कर्म मामलों में आरोपी पीड़िता के परिचित ही थे—जिनमें रिश्तेदार, पारिवारिक मित्र, पड़ोसी या झूठे वादे करने वाले शामिल थे। 2020 से 2024 के बीच नाबालिगों के खिलाफ दर्ज 1.83 लाख से अधिक मामलों में 16 से 18 वर्ष की किशोरियां सबसे बड़ा शिकार बनीं। वर्ष 2015 में जहां 18 वर्ष से कम उम्र की बालिकाओं से दुष्कर्म के 10,934 मामले थे, वहीं 2024 तक यह आंकड़ा चार गुना बढ़कर 43,675 तक पहुंच गया। इसके अलावा, वैश्विक स्वास्थ्य संगठन (WHO) और एनएफएचएस (NFHS 2019-21) के सर्वे भी तस्दीक करते हैं कि लगभग एक-तिहाई महिलाएं घरेलू दायरे में भी शारीरिक या यौन उत्पीड़न की शिकार होती हैं।

लचर दोषसिद्धि दर और खौफ के बीच आजादी की नई मांग

चिंता का विषय केवल मुकदमों की बढ़ती संख्या नहीं, बल्कि अदालतों में लंबित न्याय भी है। 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, नाबालिगों से जुड़े मामलों में कन्विक्शन रेट (दोषसिद्धि दर) करीब 30 फीसदी ही रही, जबकि 86 फीसदी से अधिक मामले अदालतों में लंबित पड़े हैं। छात्राओं का तर्क है कि जब तक न्याय प्रणाली तेज और सार्वजनिक स्थल पूरी तरह अभेद्य नहीं बनते, तब तक महिलाओं की आत्मनिर्भरता अधूरी रहेगी। मिरांडा हाउस, गार्गी, एलएसआर और डीयू के अन्य कॉलेजों की छात्राओं का यह आंदोलन अब महज एक औपचारिक ज्ञापन नहीं, बल्कि व्यवस्था से यह दो-टूक सवाल है कि अपराध रोकने के नाम पर आजादी छीनने की मानसिकता कब बदलेगी।

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