
पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में हुए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया के बाद राज्य में राजनीतिक और संवैधानिक हलचल चरम पर पहुंच गई है। अब सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं बचा है कि मतदाता सूची से कितने नाम काटे गए और कितने जोड़े गए, बल्कि सबसे गंभीर चिंता यह है कि लाखों नागरिकों की लंबित अपीलों पर अंतिम फैसला कब तक आएगा। भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने 18 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर खुलासा किया है कि एसआईआर से जुड़े फैसलों के खिलाफ कुल 38,20,683 अपीलें दाखिल की गई हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से अब तक केवल 1,02,231 अपीलों का ही निस्तारण हो सका है, जबकि 37,18,452 अपीलें आज भी सुनवाई के इंतजार में लंबित हैं।
19 अपीलीय ट्रिब्यूनल और 37 लाख मामलों का भारी बोझ
सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश पर इन मामलों की सुनवाई के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट के रिटायर्ड जजों की अध्यक्षता में 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल का गठन किया गया था, जिन्होंने 13 अप्रैल 2026 से विधिवत कामकाज शुरू किया था। पिछले करीब पांच महीनों (लगभग 158 दिनों) में ये ट्रिब्यूनल मिलकर महज 1.02 लाख मामलों का ही निपटारा कर पाए हैं। यानी कुल दाखिल अपीलों में से करीब 97.3 फीसदी मामले आज भी फाइलों में दबे पड़े हैं। इससे पहले पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड के करीब 700 न्यायिक अधिकारियों ने लगभग 60 लाख दावों और आपत्तियों की गहन जांच की थी, जिसके बाद उपजे असंतोष के चलते यह भारी-भरकम कानूनी विवाद खड़ा हुआ।
मौजूदा रफ्तार का गणित: क्या 2042 तक चलेगा अपीलों का निपटारा
यदि ट्रिब्यूनलों के काम करने की मौजूदा गति को आधार बनाकर गणितीय विश्लेषण किया जाए, तो आंकड़े बेहद चौंकाने वाले और परेशान करने वाले हैं। 13 अप्रैल से 18 सितंबर 2026 तक के 158 दिनों में 1,02,231 अपीलों के निपटारे के हिसाब से प्रतिदिन औसतन करीब 647 अपीलों का ही फैसला हो पा रहा है। यदि भविष्य में भी यही औसत रफ्तार बनी रहती है, तो बाकी बची 37,18,452 लंबित अपीलों को सुलझाने में लगभग 5,750 दिन लगेंगे। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि इन सभी अपीलों को निपटाने में करीब 189 महीने या लगभग 15 साल 9 महीने (करीब 16 साल) का वक्त लग जाएगा। गणितीय अनुमान के आधार पर यह प्रक्रिया जून 2042 के आसपास जाकर पूरी हो सकेगी। हालांकि, यह केवल मौजूदा आंकड़ों का विश्लेषण है और यदि ट्रिब्यूनल बढ़ाए जाते हैं या विशेष रणनीति बनती है तो यह समय घट भी सकता है।
गलत तरीके से नाम काटे जाने का आरोप और चुनावी समीकरण
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन के मुताबिक, एसआईआर से जुड़े जिन 83 हजार मामलों में फैसला आया है, उनमें से करीब 75 हजार मामलों में नाम काटा जाना गलत पाया गया है। उन्होंने अदालत को बताया कि कुल 38 लाख मामलों में से लगभग 31 लाख अपीलें नाम कटने के खिलाफ हैं, जबकि करीब 7 लाख मामले नाम बचाने और जोड़ने से जुड़े हैं। इस मुद्दे ने राज्य के सियासी समीकरणों को भी गरमा दिया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) का तर्क है कि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को 2.93 करोड़ और टीएमसी को 2.60 करोड़ वोट मिले थे, यानी दोनों दलों के बीच लगभग 30 लाख वोटों का अंतर था। पार्टी का दावा है कि राज्य की 31 विधानसभा सीटों पर जीत-हार का अंतर एसआईआर के तहत काटे गए नामों की संख्या से भी कम है। 23 अप्रैल को मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस जे. बागची ने भी यह गंभीर सवाल उठाया था कि यदि जीत का अंतर महज 2 फीसदी हो और 15 फीसदी पात्र मतदाता वोट डालने से वंचित रह जाएं, तो इसका चुनावी जनादेश पर क्या असर पड़ेगा।
सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: समयबद्ध तरीके से हो मामलों का निपटारा
सुप्रीम कोर्ट ने 25 अगस्त की सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग से अपीलों की कुल संख्या, उनके निपटारे की गति और लंबित मुकदमों का विस्तृत ब्योरा तलब किया था। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने आयोग से पूछा था कि इस व्यवस्था को सुगम बनाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं और क्या अतिरिक्त ट्रिब्यूनलों के गठन की जरूरत है। शीर्ष अदालत ने 24 अप्रैल को ही स्पष्ट कर दिया था कि जिन मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं और जिन्होंने तुरंत सुनवाई की गुहार लगाई है, उन्हें आउट-ऑफ-टर्न प्राथमिकता दी जाए, क्योंकि मतदाता सूची से नाम कटना सीधे तौर पर नागरिक के मताधिकार का हनन है।
फॉर्म 6 के 34 लाख आवेदन और पेंडेंसी का उलझा पेच
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, एसआईआर प्रक्रिया के समानांतर 17 दिसंबर 2025 से 7 अगस्त 2026 के बीच मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए 34.13 लाख नए Form 6 आवेदन भी प्राप्त हुए हैं। इनमें पहली बार वोटर बनने वाले युवाओं के साथ-साथ वे लोग भी शामिल हैं जिनके नाम ड्राफ्ट एसआईआर के दौरान बाहर कर दिए गए थे। हालांकि, जानकारों का कहना है कि फॉर्म 6 के आवेदन और ट्रिब्यूनल में लंबित 38.20 लाख अपीलों की कानूनी प्रकृति बिल्कुल अलग है। आयोग ने अभी तक शीर्ष अदालत को यह स्पष्ट आंकड़ा नहीं दिया है कि ट्रिब्यूनल में लंबित 37.18 लाख मामलों में से कितने नाम जोड़ने के हैं और कितने नाम हटाने की मांग से जुड़े हैं, जिस पर अदालत आगामी दिनों में कोई ठोस दिशा-निर्देश जारी कर सकती है।
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