Friday , 2 October 2026

Russia Crude Oil Tariff: रूस से तेल खरीदने पर भारत पर 100% टैरिफ लगाने की तैयारी! अमेरिकी संसद में बिल पर आगे बढ़ी वोटिंग, जानें क्या होगा असर

नई दिल्ली/वाशिंगटन रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल आयात करने को लेकर भारत और अमेरिका के बीच कूटनीतिक तनाव एक बार फिर गहराता नजर आ रहा है। अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) में रूस और ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाने वाले एक बड़े विधेयक पर मतदान की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ गई है। यदि यह विधेयक पारित होकर कानून का रूप लेता है, तो यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से भारी मात्रा में तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों से आयात होने वाले सामानों पर 100 फीसदी तक का दंडात्मक टैरिफ लगाने का असाधारण अधिकार दे देगा। भारत भी उन शीर्ष देशों में शामिल है, जिन पर इस संभावित कानूनी कार्रवाई की सीधी मार पड़ सकती है।

सीनेट से पास हो चुका है ‘ग्राहम एक्ट’, अब हाउस की बारी इस चर्चित विधेयक का नाम ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सेंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ है। अमेरिकी सीनेट ने 7 अगस्त को भारी बहुमत के साथ 86 के मुकाबले 11 मतों से इसे पहले ही हरी झंडी दे दी है। अमेरिकी विधायी प्रक्रिया के तहत कानून बनने से पहले इसे हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स से पारित कराना अनिवार्य है। दोनों सदनों से समान रूप से पारित होने के बाद ही इसे राष्ट्रपति के अंतिम हस्ताक्षर के लिए व्हाइट हाउस भेजा जाएगा।

बिल में भारत का नाम सीधे जोड़ने की कोशिश, संसद में तीखा मतभेद सीनेट से पारित मूल मसौदे में किसी देश का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं किया गया था, बल्कि खरीद मात्रा (वॉल्यूम) के आधार पर रूस से जीवाश्म ईंधन खरीदने वाले शीर्ष पांच देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का विवेकाधिकार राष्ट्रपति को देने का प्रावधान था। हालांकि, हाउस में इस बिल पर चर्चा के दौरान डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद स्टेनी होयर ने एक संशोधन पेश कर भारत और चीन का नाम सीधे तौर पर इस प्रतिबंध सूची में शामिल करने का प्रस्ताव रखा।

इस संशोधित सूची में भारत और चीन के अलावा तुर्किये, अजरबैजान, हंगरी, स्लोवाकिया, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सिंगापुर, कजाखस्तान और किर्गिज रिपब्लिक सहित कुल 10 देशों को शामिल करने की मांग की गई है। दूसरी तरफ, हाउस में एक अन्य संशोधन भी लाया गया है, जिसमें राष्ट्रपति को व्यापारिक टैरिफ लगाने का इतना बड़ा अधिकार देने वाले पूरे प्रावधान को ही हटाने की मांग की गई है। इससे साफ है कि अमेरिकी सांसदों के बीच राष्ट्रपति की ऐसी मनमानी शक्तियों को लेकर गंभीर मतभेद हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था और निर्यात पर क्या पड़ेगा असर? यदि यह कानून अपने सख्त रूप में पारित होता है और ट्रंप प्रशासन इस शक्ति का इस्तेमाल करता है, तो भारत से अमेरिका को निर्यात होने वाले तमाम उत्पादों पर 100 फीसदी तक का अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है। इससे भारतीय सामान अमेरिकी बाजार में बेहद महंगे हो जाएंगे, जिसका असर टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, जेम्स एंड ज्वेलरी और इंजीनियरिंग गुड्स के निर्यात पर पड़ सकता है। हालांकि, रणनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट कहना है कि यह वर्तमान में केवल एक ‘संभावित अधिकार’ (Enabling Power) है, भारत पर तुरंत प्रभाव से लगाया गया कोई नया टैरिफ नहीं है।

‘शैडो फ्लीट’ और रूस के ऊर्जा तंत्र पर प्रहार की योजना वाशिंगटन का मुख्य तर्क यह है कि भारत और चीन जैसे बड़े खरीदारों द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद से मॉस्को को विदेशी मुद्रा मिलती है, जिसका इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध के वित्तपोषण में किया जा रहा है। इसी कारण इस विधेयक में रूस के तेल और गैस उद्योग, संबंधित अधिकारियों और पश्चिमी प्रतिबंधों को धता बताकर तेल परिवहन में मदद करने वाले ‘शैडो फ्लीट’ (गुप्त टैंकर बेड़े) पर भी चौतरफा शिकंजा कसने का कड़ा प्रावधान किया गया है।

फिलहाल गेंद अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के पाले में है। चूंकि सदन में भारत का नाम सीधे शामिल करने और इस टैरिफ प्रावधान को पूरी तरह निरस्त करने—दोनों विकल्पों पर बहस जारी है, इसलिए अंतिम कानून का स्वरूप क्या होगा और भारत इसके दायरे में आएगा या नहीं, यह आगामी वोटिंग और अंतिम द्विदलीय समझौते पर निर्भर करेगा।

 

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