Tuesday , 29 September 2026

UPI Transaction Charges: 56 करोड़ यूजर्स के लिए बड़ा बदलाव! अब फ्री नहीं रहा डिजिटल पेमेंट, जानें 2000 से ऊपर के भुगतान पर कितना कटेगा चार्ज

नई दिल्ली देश के करीब 56 करोड़ डिजिटल उपभोक्ताओं के लिए एक बेहद अहम खबर सामने आई है। बाजार में खरीदारी के दौरान बिना सोचे-समझे क्यूआर कोड स्कैन करके भुगतान करने की आदत में अब बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई के जरिए होने वाले डिजिटल लेन-देन को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। अब यूपीआई के जरिए होने वाला हर भुगतान पूरी तरह निःशुल्क नहीं रहेगा। एक निश्चित सीमा तय करते हुए सरकार ने इस पर शुल्क लगाने का वैधानिक रास्ता साफ कर दिया है। हालांकि, राहत की बात यह है कि इस नए नियम का सीधा वित्तीय असर आम ग्राहकों की जेब पर न पड़कर व्यापारियों और कारोबारियों पर पड़ेगा।

2000 रुपये तक के लेन-देन पर कोई शुल्क नहीं वित्त मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, 2,000 रुपये तक के छोटे यूपीआई भुगतानों पर बैंक किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं वसूल सकेंगे। पहले यूपीआई से होने वाले सभी लेन-देन पूरी तरह मुफ्त थे, लेकिन अब 2,000 रुपये से अधिक की राशि के व्यापारिक लेन-देन पर शुल्क का रास्ता साफ हो गया है। भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) ने इस संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश तय कर दिए हैं। आम लोगों के बीच आपस में होने वाले ट्रांसफर (P2P लेन-देन) पूरी तरह निशुल्क बने रहेंगे। इसके साथ ही, रूपे (RuPay) डेबिट कार्ड के जरिए किए जाने वाले डिजिटल पेमेंट पर भी कोई मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू नहीं होगा।

व्यापारियों पर पड़ेगा असर, समझें MDR का पूरा गणित एनपीसीआई के नए नियमों के तहत 2,000 रुपये से अधिक के व्यापारिक लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर (Merchant Discount Rate) वसूला जाएगा। एमडीआर वह सेवा शुल्क होता है जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने की सुविधा के बदले बैंक या पेमेंट गेटवे द्वारा दुकानदार से लिया जाता है।

  • 5,000 रुपये का भुगतान: 0.4 प्रतिशत की दर से दुकानदार को 20 रुपये चुकाने होंगे।

  • 10,000 रुपये का लेन-देन: कारोबारी के खाते से 40 रुपये कटेंगे।

  • 75,000 रुपये से अधिक: अधिकतम एमडीआर की सीमा 300 रुपये पर सीमित कर दी गई है।

  • विशेष सेवाएं: रेलवे, दूरसंचार, बीमा और पेट्रोल-डीजल पर 5 रुपये का फ्लैट एमडीआर लागू रहेगा।

  • शेयर बाजार व म्यूचुअल फंड: स्टॉक ब्रोकर, सिक्योरिटीज और म्यूचुअल फंड निवेश पर 0.02 प्रतिशत एमडीआर लगेगा।

  • छोटे व्यापारियों को छूट: ऐसे छोटे दुकानदार जिनका क्यूआर कोड के माध्यम से मासिक टर्नओवर 1 लाख रुपये तक है, उन्हें शून्य एमडीआर का लाभ मिलेगा। यह पूरी व्यवस्था 15 अक्टूबर से प्रभावी कर दी गई है।

फैसले पर गरमाई राजनीति, विपक्ष ने उठाए सवाल यूपीआई शुल्क लागू होते ही राजनीतिक गलियारों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे अमेरिकी पेमेंट कंपनियों के दबाव में लिया गया फैसला करार देते हुए सोशल मीडिया पर निशाना साधा। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार भले ही कहे कि ग्राहक से कोई पैसा नहीं लिया जाएगा, लेकिन व्यापारी इस अतिरिक्त खर्च को अंततः वस्तुओं के दाम बढ़ाकर आम जनता की जेब से ही वसूलेंगे। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी इसे महंगाई से जूझ रही जनता पर परोक्ष प्रहार बताया। दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी के नेता अनुराग ढांडा ने आरोप लगाया कि पहले जनता को मुफ्त का लालच देकर आदत डलवाई गई और अब उससे पैसे वसूले जा रहे हैं।

बीजेपी का पलटवार: ऐतिहासिक सफलता से परेशान है विपक्ष विपक्षी दलों के हमलों का जवाब देते हुए भारतीय जनता पार्टी के नेता नलिन कोहली ने कहा कि यूपीआई भारत की एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक सफलता है। प्रधानमंत्री जन धन योजना से लेकर डिजिटल लेन-देन के विस्तार तक, यह मोदी सरकार की राष्ट्रीय उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि विपक्ष विकास कार्यों में सहयोग करने के बजाय केवल आधारहीन आलोचना की राजनीति में लगा हुआ है।

आखिर क्यों पड़ी शुल्क लगाने की जरूरत? सब कुछ मुफ्त चलने के बाद अचानक शुल्क तय करने के पीछे के आंकड़े काफी चौंकाने वाले हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में 314 लाख करोड़ रुपये के 24,000 करोड़ से अधिक यूपीआई सौदे दर्ज किए गए। विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखें तो 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान कुल संख्या का मात्र 4 प्रतिशत हैं, लेकिन कुल मूल्य के हिसाब से इनकी हिस्सेदारी लगभग दो-तिहाई यानी करीब 67 प्रतिशत बैठती है। यानी लेन-देन की संख्या भले कम हो, लेकिन ट्रांसफर होने वाली पूंजी बेहद विशाल है। 25 अगस्त 2016 को शुरू हुआ यूपीआई आज वैश्विक स्तर पर 11 देशों में स्वीकार्य है, जिसमें हाल ही में जुड़ा उज्बेकिस्तान और सिंगापुर, यूएई, फ्रांस, मॉरीशस, नेपाल, भूटान, कतर, श्रीलंका, कंबोडिया तथा यूनान शामिल हैं।

क्या ग्राहकों की जेब पर पड़ेगा परोक्ष बोझ? सरकार का तर्क है कि इतने विशालकाय बैंकिंग नेटवर्क को साइबर फ्रॉड से सुरक्षित रखने, तकनीकी ढांचे को निरंतर अपग्रेड करने और सर्वर क्षमता बनाए रखने के लिए भारी पूंजीगत खर्च की आवश्यकता होती है। अब बाजार में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या व्यापारी इस 0.4 प्रतिशत के शुल्क का बोझ खुद वहन करेंगे, या फिर परोक्ष रूप से उत्पादों और सेवाओं के बिल में इसे जोड़कर अंततः आम उपभोक्ता पर ही स्थानांतरित कर देंगे।

 

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