नई दिल्ली। दुनिया भर में पड़ रही रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और जलवायु परिवर्तन ने इंसानी जिंदगी को बेपटरी कर दिया है। यूरोपीय देशों का हाल सबसे ज्यादा बेहाल है, जहां फ्रांस में भीषण हीटवेव के चलते 1000 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। वहीं जर्मनी, स्पेन और ब्रिटेन जैसे ठंडे देशों में पारा इस कदर बढ़ गया है कि वहां की डामर वाली सड़कें पिघलने लगी हैं। स्थानीय लोग मान रहे हैं कि इतिहास में ऐसी जानलेवा गर्मी कभी नहीं देखी गई। भारत का हाल भी इससे जुदा नहीं है। देश के बड़े हिस्से में आसमान से आग बरस रही है। राजधानी दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में जून का महीना बीतने को है, लेकिन मॉनसून की ढंग से बारिश नहीं हुई है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इस तबाही के पीछे सबसे बड़ा विलेन ‘अल नीनो’ (El Nino) है, जिसे लेकर आया ताजा अपडेट बेहद डराने वाला है।
भारत के 300 जिलों को अपनी चपेट में लेगा अल नीनो, UN की बड़ी चेतावनी
क्लाइमेट वार्मिंग के गहराते संकट के बीच भारत के लिए पहले यह अनुमान था कि देश के केवल 111 जिलों पर अल नीनो का असर पड़ेगा। लेकिन अब जो नया और संशोधित अपडेट आया है, उसने सरकार की नींद उड़ा दी है। नए आंकड़ों के मुताबिक, देश के 12 राज्यों के करीब 300 जिले सीधे तौर पर अल नीनो के दुष्परिणामों को झेलने वाले हैं।
इस वैश्विक महासंकट की गंभीरता को संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) के सेक्रेटरी जनरल एंटोनियो गुटेरेस की इस चेतावनी से समझा जा सकता है:
“आने वाले महीनों में 90% संभावना है कि अल नीनो हमारे दरवाजे पर दस्तक देगा। दुनिया को इसे जलवायु से जुड़ी एक बेहद जरूरी और अंतिम चेतावनी के तौर पर लेना चाहिए। अल नीनो पहले से ही गर्म हो रही दुनिया में ‘आग में घी’ का काम करेगा। इसके विनाशकारी असर बेहद जबरदस्त होंगे, दूर-दूर तक फैलेंगे और बहुत तेजी से भौगोलिक सीमाओं को पार कर जाएंगे।”
पैसिफिक महासागर में गहराया संकट, WMO ने जारी की रिपोर्ट
यह भयावह चेतावनी संयुक्त राष्ट्र की संस्था वर्ल्ड मेटियोरोलॉजिकल ऑर्गनाइज़ेशन (WMO) की ताजा रिपोर्ट के आधार पर दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रॉपिकल पैसिफिक (उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर) में समुद्र का पानी असामान्य रूप से गर्म हो रहा है, जिससे अल नीनो की स्थितियां बेहद मजबूत हो रही हैं।
WMO के आकलन के मुताबिक, जून से अगस्त 2026 के दौरान अल नीनो इवेंट एक्टिव होने की संभावना 80% है। वहीं, इसके कम से कम नवंबर तक बने रहने की आशंका 90% या उससे भी ज्यादा है। ज्यादातर फोरकास्ट मॉडल इशारा कर रहे हैं कि यह अल नीनो सिर्फ मध्यम नहीं, बल्कि बेहद ‘स्ट्रांग’ यानी आक्रामक रूप ले सकता है। इसके कारण दुनिया भर में तापमान बढ़ेगा, बारिश का पैटर्न पूरी तरह बिगड़ जाएगा और आने वाले महीनों में प्राकृतिक आपदाओं का ग्राफ तेजी से ऊपर जाएगा। भारत में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर इसके सीधे असर को लेकर देश के नीति निर्माताओं में तनाव साफ देखा जा सकता है।
ICAR का बड़ा खुलासा: 315 जिलों में सूखे की आहट, 12 राज्य सबसे संवेदनशील
इस बड़े खतरे से निपटने के लिए ग्रामीण विकास और कृषि मंत्रालय ने युद्ध स्तर पर तैयारियां शुरू कर दी हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा, “हमने शुरुआत में उन 111 जिलों की पहचान की थी जहां अल नीनो का सबसे घातक असर पड़ सकता है। लेकिन अब जो रिपोर्ट है, उसके मुताबिक प्रभावित जिलों की संख्या 300 से पार जा सकती है। हमने सभी संबंधित राज्यों को संवेदनशील इलाकों की पूरी लिस्ट सौंप दी है। प्रभावित होने वाले इन सभी जिलों में खेती या रोजगार का जो भी नुकसान होगा, उसके लिए ‘जी राम जी’ कानून के तहत प्रभावित लोगों को रोजगार देने के लिए प्रशासन पूरी तरह तैयार रहेगा।”
इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICAR) और कृषि मंत्रालय ने वैज्ञानिक डेटा के आधार पर देश के 315 जिलों का एक विशेष आकलन तैयार किया है। ये वे जिले हैं जहां कम बारिश और सिंचाई के साधनों की भारी कमी है। इन 315 जिलों में से 111 जिले ऐसे हैं जहां सिंचाई का दायरा महज 25 फीसदी से भी कम है, जबकि 76 जिलों में यह 25 से 50 प्रतिशत के बीच है।
सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले 12 राज्य:
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उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और झारखंड
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महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान
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कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा
जून में 43% कम बरसे बदरा, मॉनसून की सुस्त चाल ने बढ़ाई टेंशन
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की ताजा रिपोर्ट के आंकड़े डराने वाले हैं। इस साल 1 से 27 जून के बीच देश में औसत से 43% कम बारिश दर्ज की गई है। आमतौर पर इस अवधि में देश में औसतन 141.8 मिलीमीटर बारिश होती है, लेकिन इस बार जून के आखिरी हफ्ते तक महज 80.4 मिलीमीटर पानी ही बरसा है।
अगर क्षेत्रवार बात करें तो सेंट्रल इंडिया (मध्य भारत) में औसत से 57% कम बारिश हुई है। पूर्वी और उत्तरपूर्वी भारत में 44% तथा दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में 30% बारिश की कमी रही है। वहीं उत्तर-पश्चिम भारत में भी बारिश का ग्राफ 27% गिर गया है। मॉनसून के सामान्य से काफी लेट होने के कारण स्थिति लगातार बिगड़ रही है, जिसका सीधा और घातक असर खरीफ की फसलों (धान, मक्का आदि) पर पड़ने जा रहा है, जो पूरी तरह मानसूनी बारिश पर निर्भर हैं।
‘जी राम जी’ कानून से सुधारे जाएंगे तालाब, पानी और चारे के लिए कड़ा प्लान
इस भीषण सूखे जैसी स्थिति से निपटने के लिए कृषि मंत्रालय ने सभी राज्यों के कृषि मंत्रियों और जिला कलेक्टरों को आपातकालीन निर्देश जारी किए हैं। प्रभावित जिलों में मौजूद पुराने तालाबों, जलाशयों, नालों, खेत-तालाबों और चेक डैम को तत्काल दुरुस्त और गहरा करने का काम शुरू कर दिया गया है। इसके लिए 1 जुलाई से प्रभावी होने वाले “जी राम जी” कानून के तहत आवंटित किए गए विशेष फंड्स का इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि बारिश की एक-एक बूंद को सहेज कर उसे खेती और पेयजल के काम में लाया जा सके।
कृषि मंत्री के अनुसार, संकट के समय में ‘पीने के पानी’ को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। यदि स्थिति ज्यादा बिगड़ती है, तो जिन क्षेत्रों में पानी सरप्लस (अतिरिक्त) है, वहां से पानी की किल्लत वाले इलाकों में पाइपलाइनों या टैंकर्स के जरिए सप्लाई सुनिश्चित की जाएगी।
इंसानों के साथ-साथ बेजुबान जानवरों पर भी इस अल नीनो का बड़ा कहर टूटने वाला है, क्योंकि कमजोर मॉनसून के चलते देश में चारे का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। इसे देखते हुए कृषि मंत्रालय ने अभी से चारा स्टॉकिंग, वैकल्पिक चारे के स्रोत और मजबूत सप्लाई चेन की प्लानिंग कर ली है। जिन राज्यों में चारा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है, वहां से कमी वाले 300 प्रभावित जिलों में इसकी समय पर सप्लाई की जाएगी ताकि पशुपालकों को किसी भी तरह की बड़ी किल्लत का सामना न करना पड़े।
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