नई दिल्ली/कोलकाता: पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों ने देश की राजनीति का चेहरा पूरी तरह बदल दिया है। जहाँ बीजेपी बंगाल, असम और पुडुचेरी में भगवा लहराने को तैयार है, वहीं तमिलनाडु में ‘थलापति’ विजय की टीवीके (TVK) ने दशकों पुराने द्रविड़ किलों को ध्वस्त कर दिया है। केरल में कांग्रेस की वापसी हो रही है। लेकिन इस चुनाव की सबसे चौंकाने वाली बात रही ‘मुस्लिम कार्ड’ का पूरी तरह फेल होना। पश्चिम बंगाल से लेकर असम तक, खुद को मुसलमानों का मसीहा बताने वाले दिग्गजों को जनता ने सिरे से नकार दिया है।
बंगाल: हुमायूं कबीर और पीरजादा नौशाद की उम्मीदों पर फिरा पानी
पश्चिम बंगाल में टीएमसी से अलग होकर अपनी पार्टी ‘आम जनता उन्नयन पार्टी’ बनाने वाले हुमायूं कबीर को करारी शिकस्त मिली है। 115 सीटों पर उम्मीदवार उतारने वाले कबीर अपनी दोनों सीटों—रेजीनगर और नोआदा—से पीछे चल रहे हैं। बाबरी मस्जिद की नींव रखने जैसे दांव भी उनके काम नहीं आए।
दूसरी ओर, फुरफुरा शरीफ के पीरजादा नौशाद सिद्दीकी की पार्टी ISF (इंडियन सेकुलर फ्रंट) का भी सूपड़ा साफ होता नजर आ रहा है। लेफ्ट के साथ गठबंधन के बावजूद नौशाद सिद्दीकी अपनी सुरक्षित मानी जाने वाली भांगड़ सीट से पीछे हैं, जहाँ टीएमसी के शौकत मोल्ला ने बढ़त बना रखी है। मुस्लिम मतदाताओं ने इस बार छोटे दलों के बजाय सीधे मुख्यधारा की पार्टियों पर भरोसा जताया।
असम: ‘किंगमेकर’ बदरुद्दीन अजमल का बिखरा साम्राज्य
असम की राजनीति के कभी ‘किंगमेकर’ कहे जाने वाले बदरुद्दीन अजमल और उनकी पार्टी AIUDF आज हाशिए पर नजर आ रही है। कांग्रेस से गठबंधन टूटने के बाद अजमल की पार्टी इस बार सिर्फ 2 सीटों पर सिमटती दिख रही है। खुद अजमल बिन्नाकांडी से आगे तो हैं, लेकिन पार्टी को 14 सीटों का भारी नुकसान हो रहा है। कांग्रेस ने ध्रुवीकरण के डर से अजमल से किनारा किया था, जिसका फायदा उन्हें मुस्लिम वोटों के रूप में तो मिला, लेकिन बीजेपी के पक्ष में हुए हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण ने कांग्रेस और एआईयूडीएफ दोनों का खेल बिगाड़ दिया।
ओवैसी का ‘बिहार वाला फॉर्मूला’ बंगाल में फेल
हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM पश्चिम बंगाल और असम में कोई भी प्रभाव छोड़ने में नाकाम रही। बंगाल में ओवैसी ने 8 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन वे किसी भी सीट पर दूसरे नंबर पर भी नहीं हैं। ओवैसी ने असम में अजमल के समर्थन में धुआंधार रैलियां की थीं, लेकिन ‘ताला-चाबी’ (AIUDF का चुनाव चिन्ह) जनता के दिलों का ताला नहीं खोल पाई।
नतीजों का निचोड़: मुख्य दलों में सिमटा मुकाबला
इन चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया है कि मुस्लिम बहुल इलाकों में भी जनता अब वोट कटवा पार्टियों या धार्मिक आधार पर बनी पार्टियों के बजाय बड़ी पार्टियों (बीजेपी, टीएमसी या कांग्रेस) को चुनना पसंद कर रही है। दक्षिण 24 परगना, मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिलों के रुझान इसी ओर इशारा कर रहे हैं।
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