
नई दिल्ली दुनिया के नक्शे पर अलग-अलग महाद्वीपों में बसे देशों की भाषा, संस्कृति और सियासत भले ही जुदा हो, लेकिन सड़कों पर दिखने वाला मंजर बिल्कुल एक जैसा है। हाथ में स्मार्टफोन और जुबान पर तीखे सवाल लिए युवा सीधे हुकूमतों की आंखों में आंखें डालकर जवाब मांग रहे हैं। बांग्लादेश, नेपाल, केन्या और मेडागास्कर से लेकर अब भारत तक—जेन ज़ेड (1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी) के भीतर गहराता असंतोष साफ नजर आने लगा है। डिजिटल क्रांति और सोशल मीडिया के दौर में पली-बढ़ी यह पीढ़ी दुनिया से पूरी तरह कनेक्टेड है, अपने नागरिक अधिकारों को बखूबी समझती है और खोखले आश्वासनों के बजाय जमीन पर ठोस नतीजे चाहती है।
क्यों सड़कों पर उतर रही है यह पीढ़ी: समझिए साझा वजहें
सरहदों के पार फैले इन तमाम आंदोलनों की जड़ें टटोलें तो उनमें गजब की समानता दिखाई देती है। बढ़ती बेरोजगारी, बेलगाम महंगाई, संस्थागत भ्रष्टाचार, राजनीति में पसरा परिवारवाद, इंटरनेट और अभिव्यक्ति पर लगाई जाने वाली पाबंदियां और बुनियादी सुविधाओं की बदहाली ने युवाओं के सब्र का बांध तोड़ दिया है। जब दिन-रात पसीना बहाने के बाद भी हाथों में डिग्री लिए युवाओं को रोजगार नहीं मिलता, सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार के चलते रास्ते बंद दिखते हैं और हुक्मरान उनकी आवाज को अनसुना कर देते हैं, तो यही निराशा सड़कों पर उग्र आंदोलन की शक्ल अख्तियार कर लेती है।
बांग्लादेश से नेपाल तक: तख्तापलट और इस्तीफों का सिलसिला
युवाओं के इस वैश्विक आक्रोश का सबसे बड़ा असर हाल के महीनों में सत्ता के शीर्ष पर दिखा है। जुलाई 2024 में बांग्लादेश के भीतर सरकारी नौकरियों में आरक्षण के विवाद से भड़का छात्रों का आंदोलन देखते ही देखते व्यापक जनविद्रोह बन गया। हालात इतने बिगड़ गए कि 5 अगस्त 2024 को प्रधानमंत्री शेख हसीना को अपना पद छोड़कर मुल्क से सुरक्षित निकलना पड़ा।
पड़ोसी देश नेपाल में भी सितंबर 2025 के दौरान सोशल मीडिया पाबंदियों ने आग में घी का काम किया। वहां गहराते भ्रष्टाचार, राजनीतिक भाई-भतीजावाद और नौकरियों के अभाव से तंग आए युवाओं के भारी विरोध के आगे प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी।
केन्या और मेडागास्कर: टैक्स और बुनियादी सुविधाओं पर जनता का फैसला
अफ्रीकी मुल्कों में भी नई पीढ़ी ने अपनी ताकत का लोहा मनवाया है। जून 2024 में केन्या के भीतर प्रस्तावित टैक्स बढ़ोतरी वाले वित्त विधेयक के विरोध में युवा सड़कों पर उतर आए। आक्रोश इतना जबरदस्त था कि प्रदर्शनकारी संसद भवन परिसर तक जा पहुंचे, जिसके चलते राष्ट्रपति विलियम रूटो को बैकफुट पर आते हुए उस विवादित बिल को वापस लेने का ऐलान करना पड़ा।
उधर सितंबर 2025 में मेडागास्कर के अंदर पानी और बिजली के गंभीर संकट ने चिंगारी का काम किया। यह गुस्सा जल्द ही प्रशासनिक नाकामी और करप्शन के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलन में बदला, जिसका नतीजा अक्टूबर 2025 में राष्ट्रपति एंड्री राजोएलिना की सत्ता के खात्मे के रूप में सामने आया।
सोशल मीडिया बना हथियार: वादों से नहीं, नतीजों से बात बनेगी
इन सभी लड़ाइयों में सोशल मीडिया एक ऐसा मंच बनकर उभरा है, जिसने भौगोलिक दूरियों को बेमानी कर दिया। जेन ज़ेड अपनी समस्याओं को साझा करने, विरोध प्रदर्शनों को तेजी से संगठित करने और दूसरे देशों के जनआंदोलनों से रणनीति सीखने के लिए इस डिजिटल प्लेटफॉर्म का भरपूर इस्तेमाल कर रही है। यह पीढ़ी परंपरागत बयानों और चुनावी वादों से संतुष्ट होने वाली नहीं है। उनकी मांग बेहद स्पष्ट है—पढ़ाई पूरी होते ही योग्यता के आधार पर रोजगार, मेहनत की कद्र, टैक्स के बदले मुकम्मल बुनियादी सुविधाएं और अभिव्यक्ति की पूरी आजादी।
बेशक इन युवाओं ने अपनी लामबंदी से ताकतवर हुकूमतों को झुका दिया है, मगर इन आंदोलनों की सबसे बड़ी परीक्षा तख्तापलट के बाद शुरू होती है। सत्ता बदल देना जितना आसान है, बरसों से सड़ी-गली व्यवस्था को पटरी पर लाना उतना ही चुनौतीपूर्ण काम है। जेन ज़ेड की यह बगावत केवल सरकारों के खिलाफ नाराजगी नहीं, बल्कि सम्मान, बराबरी और सुरक्षित भविष्य की मुकम्मल लड़ाई है।
voice of india