Thursday , 1 October 2026

रूस से तेल पर भारत को घेरने चला था अमेरिका, खुद के गले की फांस बना 100% टैरिफ बिल; अपनी ही रसोई में आग लगाने जैसा दांव

वॉशिंगटन/नई दिल्ली । रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर नकेल कसने के लिए अमेरिकी संसद (कांग्रेस) ने एक बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए नया विधेयक पारित कर दिया है। ‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट’ शीर्षक वाले इस कानून के तहत भारत और चीन जैसे प्रमुख आयातक देशों से आने वाले सामानों पर 100 फीसदी तक भारी-भरकम टैरिफ (आयात शुल्क) थोपने का खाका तैयार किया गया है। पहली नजर में यह दांव भारत को कूटनीतिक और आर्थिक रूप से बैकफुट पर धकेलने का एक बड़ा हथियार नजर आता है, लेकिन वैश्विक व्यापार व आर्थिक मामलों के जानकारों का स्पष्ट मानना है कि वाशिंगटन का यह तीर उल्टा उसी के सीने में चुभने वाला है। यदि अमेरिकी प्रशासन भारतीय उत्पादों पर शत-प्रतिशत टैक्स लगाता है, तो इसका सीधा और विनाशकारी प्रभाव भारत से ज्यादा खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था और वहां के आम नागरिकों पर पड़ेगा। यह कदम भारत पर दबाव बनाने की होड़ में अपनी ही रसोई में आग झोंक देने जैसा साबित होगा।

दवाइयों और कपड़ों के दाम होंगे दोगुने, महंगाई की आग में झुलसेगी अमेरिकी जनता वर्तमान में अमेरिका पहले से ही कमरतोड़ महंगाई और ब्याज दरों के दबाव से जूझ रहा है। ऐसे नाज़ुक मोड़ पर टीटी लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर संजय के जैन का विश्लेषण है कि वाशिंगटन का यह फैसला जलती आग में घी की तरह काम करेगा। अमेरिका भारतीय बाजार से भारी मात्रा में रेडीमेड कपड़े, जरूरी घरेलू सामान और जीवनरक्षक जेनेरिक दवाइयां आयात करता है। इन आवश्यक भारतीय वस्तुओं पर 100 फीसदी टैक्स लगते ही अमेरिकी सुपरमार्केट्स में दैनिक उपभोग की चीजें रातों-रात दोगुनी कीमत पर बिकने लगेंगी। आम अमेरिकी परिवार पहले से ही बढ़े हुए लिविंग कॉस्ट से त्रस्त हैं, ऐसे में चुनावी व राजनीतिक दबाव के बीच अपनी ही जनता पर महंगाई का भयानक बोझ लादना अमेरिका की सबसे बड़ी आर्थिक भूल सिद्ध हो सकता है।

दबाव बनाकर मनमाना सौदा थोपने की रणनीति होगी बेअसर वैश्विक व्यापार में कड़े प्रतिबंधों और कानूनों का हव्वा दिखाकर विकासशील देशों से अपने मनमुताबिक समझौते कराना अमेरिका की पुरानी कार्यप्रणाली रही है। आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, इस नए कानून के जरिए वाशिंगटन भारत को रूसी कच्चे तेल की खरीद से रोककर अनुचित व्यापारिक रियायतें हासिल करने की फिराक में है। अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (AEPC) के चेयरमैन ए. शक्तिवेल का कहना है कि यह विधेयक भारत को डराने और दबाव बनाने का महज एक पैंतरा है। प्रतिष्ठित थिंक-टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) ने भी आगाह किया है कि भारत को रूसी तेल से दूर करने के चक्कर में अमेरिका यह भूल रहा है कि सस्ते व गुणवत्तापूर्ण भारतीय आयात के बिना उसकी अपनी घरेलू सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा जाएगी।

भारतीय निर्यातकों की हर चाल पर पैनी नजर, वैकल्पिक बाजारों का मजबूत सहारा फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशंस (FIEO) के महानिदेशक अजय सहाय के मुताबिक, किसी भी देश द्वारा नए टैरिफ के ऐलान से वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता का माहौल जरूर बनता है, लेकिन भारतीय निर्यातक इस पूरे घटनाक्रम पर रणनीतिक पकड़ बनाए हुए हैं। संभावित नुकसान और टैरिफ लागू होने से पहले कई निर्यातक अपने मौजूदा शिपमेंट समय से पूर्व रवाना करने की योजना पर तेजी से काम कर रहे हैं। अमेरिकी संसद से बुधवार को पारित हो चुके इस बिल को अब अंतिम मुहर के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। भारत के लिए राहत की बात यह है कि उसके पास यूरोप, पश्चिम एशिया, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका जैसे मजबूत वैश्विक बाजारों के कई ठोस विकल्प मौजूद हैं। ऐसे में यदि अमेरिका अपने बाजार के दरवाजे महंगे करता है, तो भारत अपने निर्यात का रुख अन्य देशों की तरफ आसानी से मोड़ देगा, जबकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में यह फैसला भारी उथल-पुथल मचा सकता है।

 

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