Monday , 5 October 2026

रील्स, विरोध और संवैधानिक दीवार: चुनाव आयोग के खिलाफ CJP के आंदोलन का पूरा सच, क्या सचमुच जा सकती है CEC की कुर्सी?

नई दिल्ली राजनीति और जनआंदोलनों का मिजाज अब पारंपरिक चौराहों से निकलकर सोशल मीडिया एल्गोरिदम के मुताबिक तय होने लगा है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के कर्ता-धर्ता अभिजीत दीपके द्वारा महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली विधानसभा चुनाव नतीजों का ठीकरा सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के सिर फोड़े जाने के बाद सियासी गलियारों में बहस छिड़ गई है। सोशल मीडिया पर फैक्ट-चेकर्स यह साबित करने में जुटे हैं कि संबंधित चुनाव ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति से पहले के दौर के हैं, लेकिन जमीनी विरोध प्रदर्शनों का गणित तथ्यों की पड़ताल से ज्यादा ‘धारणा’ बनाने पर टिका होता है। जब व्यवस्था के खिलाफ एक नैरेटिव तैयार करने की ठान ली जाए, तो घटनाओं की सटीक क्रोनोलॉजी से ज्यादा एजेंडे का प्रभाव प्राथमिक हो जाता है।

‘जहां कीवर्ड, वहां हम’: डिजिटल रणनीतिकार के तौर पर CJP CJP की हालिया कार्यप्रणाली को बारीकी से देखें तो उनकी कार्यशैली “जहां कीवर्ड, वहां हम” के सिद्धांत पर चलती दिखाई देती है। पेपर लीक के दौरान उपजे जनाक्रोश को डिजिटल माध्यमों से भुनाने के बाद जब इनका ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान सोशल मीडिया की टाइमलाइन पर धीमा पड़ा, तो संगठन ने तुरंत सबसे गर्म और ट्रेंडिंग कीवर्ड ‘एसआईआर’ (SIR) और ‘चुनाव आयोग’ की कमान थाम ली। दिलचस्प यह है कि दिल्ली में विपक्षी दलों के केंद्रीय दफ्तर और निर्वाचन सदन मौजूद होने के बावजूद इस अभियान का पहला चरण मुंबई के शिवाजी पार्क से शुरू किया गया। पहले दौर के शोर के बाद अब इस सिलसिले का अगला पड़ाव 10 अक्टूबर को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली तय किया गया है।

विपक्ष और आयोग दोनों पर सीधा प्रहार: अकेले रखवाले की छवि चुनावों में कथित गड़बड़ी का मुद्दा यूं तो लंबे समय से विपक्षी दलों के एजेंडे में रहा है, लेकिन विपक्ष के किसी साझा मंच पर आने से पहले ही CJP ने इस मुद्दे को हाइजैक करते हुए सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग दाग दी। इसके साथ ही CJP ने विपक्षी दलों के राजनीतिक रुख पर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका तर्क है कि यदि चुनावों की निष्पक्षता पर वाकई गहरा संदेह है, तो विपक्षी दल विरोध के साथ-साथ उन्हीं चुनावों में नामांकन क्यों दाखिल करते हैं और उनका बहिष्कार क्यों नहीं करते? इस आक्रामक रुख के जरिए संगठन खुद को लोकतांत्रिक अधिकारों का एकमात्र बेबाक पैरोकार साबित करने की कोशिश में है।

विपक्षी दलों और CJP की राहों में बुनियादी फर्क मुद्दे की समानता दिखने के बावजूद मुख्य विपक्षी दलों और CJP के बीच स्पष्ट फासला नजर आता है। इसकी सबसे बड़ी कानूनी वजह यह है कि CJP कोई चुनाव आयोग द्वारा पंजीकृत राजनीतिक दल नहीं है। निर्वाचन आयोग का संवैधानिक दायरा केवल मान्यता प्राप्त या पंजीकृत राजनीतिक दलों के साथ औपचारिक संवाद का होता है, किसी गैर-पंजीकृत प्रेशर ग्रुप के साथ नहीं। संवैधानिक मंचों तक पहुंच न होने के कारण CJP के पास अदालतों का रुख करने या सड़क पर प्रदर्शन करने के अलावा आयोग से औपचारिक वार्ता का कोई अधिकार नहीं है। दूसरी ओर, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल संसद और अदालती कार्यप्रणाली के तहत आगे बढ़ते हैं और वे मीम्स या रील्स पर टिके अनियंत्रित अभियानों से एक सुरक्षित दूरी बनाकर ही चलना पसंद करते हैं।

धर्मेंद्र प्रधान बनाम ज्ञानेश कुमार: संवैधानिक पद और राजनीतिक मजबूरी का अंतर NEET पेपर लीक विवाद के समय धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मिसाल देकर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की तुलना की जा रही है, लेकिन दोनों पदों की प्रकृति में जमीन-आसमान का अंतर है। धर्मेंद्र प्रधान एक सक्रिय राजनेता थे, जिनका पद सीधे तौर पर राजनीतिक जवाबदेही, आगामी चुनावों के वोट बैंक और जनदबाव पर निर्भर था। जब सरकार को युवाओं में व्यापक नाराजगी दिखी, तो राजनीतिक नुकसान रोकने के लिए कदम उठाया गया। इसके विपरीत, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था के प्रमुख हैं। उनका पद किसी दल की चुनावी हार-जीत या सोशल मीडिया ट्रेंड्स से संचालित नहीं होता। संविधान के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद में महाभियोग जैसी अत्यंत जटिल और विशिष्ट प्रक्रिया की आवश्यकता होती है, जो राष्ट्रपति के जरिए ही संभव है। जब तक आयोग के भीतर संवैधानिक प्रक्रियाएं सुचारु हैं, तब तक किसी गैर-पंजीकृत दबाव समूह के जरिए संवैधानिक मुखिया को हटाना कानूनी रूप से आसान नहीं है, हालांकि अप्रत्याशित राजनीतिक फैसलों की संभावनाओं को सियासत में कभी पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता।

 

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