Wednesday , 7 October 2026

राज्यसभा चुनाव: एनडीए कोटे से जयंत सिंह के दोबारा उच्च सदन जाने की अटकलों पर लगा विराम, समझिए पर्दे के पीछे का पूरा सियासी गणित

 लखनऊ।  राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के अध्यक्ष और केंद्रीय कौशल विकास एवं उद्यमशीलता राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) चौधरी जयंत सिंह को एनडीए के सहयोग से दोबारा राज्यसभा भेजे जाने की सियासी चर्चाओं पर फिलहाल विराम लग गया है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा उच्च सदन के आगामी चुनावों के लिए अपने आठ प्रत्याशियों की औपचारिक सूची जारी किए जाने के बाद इन तमाम कयासों पर ब्रेक लग गया। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर थी कि भाजपा अपने कोटे से जयंत सिंह को एक बार फिर उच्च सदन भेज सकती है, लेकिन उम्मीदवारों की सूची सामने आते ही स्थिति पूरी तरह साफ हो गई।

सपा के समर्थन से 2022 में उच्च सदन पहुंचे थे जयंत, 2028 तक है कार्यकाल

चौधरी जयंत सिंह जुलाई 2022 में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के साझा प्रत्याशी के तौर पर राज्यसभा पहुंचे थे। उस दौरान 403 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधानसभा में एक सदस्य को जीत दर्ज करने के लिए 34 प्राथमिक मतों की जरूरत थी। उस समय सपा के 111 और रालोद के आठ विधायकों के साथ-साथ विपक्षी गठबंधन के पास तीन सीटें आसानी से जीतने का पर्याप्त संख्या बल मौजूद था। सपा के समर्थन के दम पर जयंत तीसरे उम्मीदवार के रूप में निर्विरोध संसद के उच्च सदन पहुंचे थे। इसके बाद खतौली विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में जीत दर्ज करने के बाद विधानसभा में रालोद के विधायकों की संख्या बढ़कर नौ हो गई थी।

एनडीए में जाने के बाद शुरू हुआ था ‘सियासी एहसान’ उतारने का मंथन

वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव से ऐन पहले रालोद ने समाजवादी पार्टी और विपक्षी गठबंधन का साथ छोड़कर भारतीय जनता पार्टी नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का दामन थाम लिया था। केंद्र की एनडीए सरकार में मंत्री बनने के बाद से ही राजनीतिक हलकों में यह कयासबाजी शुरू हो गई थी कि क्या जयंत सिंह अपनी मौजूदा राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा के समर्थन से नए कार्यकाल के लिए उच्च सदन जाएंगे। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा था कि ऐसा करके वे अखिलेश यादव के समर्थन से मिली सीट का ‘सियासी एहसान’ चुका सकते हैं और सपा के हमलों की धार भी कुंद हो सकती है। हालांकि, जयंत का वर्तमान कार्यकाल जुलाई 2028 तक सुरक्षित है, जिसके चलते तात्कालिक तौर पर इस्तीफे और नए चुनाव की आवश्यकता नहीं पड़ी।

जुबानी जंग और तल्ख रिश्तों के बीच नए समीकरण

गठबंधन टूटने के बाद से ही अखिलेश यादव और जयंत सिंह के बीच राजनीतिक तल्खी लगातार बढ़ती दिखी है। अखिलेश यादव ने सार्वजनिक मंचों से बिना नाम लिए ‘चवन्नी का रुपया’ बनने और फिर साथ छोड़ जाने की टिप्पणी की थी, जिस पर जयंत सिंह ने तीखा पलटवार करते हुए इसे किसानों और जाट समाज के स्वाभिमान से जोड़ा था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दोनों दलों के बीच वर्चस्व की यह लड़ाई और तेज होने के आसार हैं। फिलहाल भाजपा के प्रत्याशियों के एलान के साथ ही जयंत सिंह के इस सत्र में दोबारा राज्यसभा नामांकन की तमाम अटकलें पूरी तरह समाप्त हो गई हैं।

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