Wednesday , 21 October 2026

यूपी की राजनीति में बड़ा उलटफेर? राजा भैया के आवास ‘रामायण’ पहुंचे बीजेपी अध्यक्ष पंकज चौधरी, बंद कमरे में हुई मुलाकात से गरमाई सियासत

उत्तर प्रदेश की राजनीति में आगामी विधानसभा चुनाव और विधान परिषद चुनाव से पहले नई बिसात बिछनी शुरू हो गई है। राजधानी लखनऊ स्थित जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के प्रमुख और कुंडा से विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के आवास ‘रामायण’ पर भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की मौजूदगी ने सियासी पारा चढ़ा दिया है। इस बैठक में एमएलसी गोविंद नारायण शुक्ला भी मौजूद रहे। बाहर से भले ही इसे औपचारिक और शिष्टाचार भेंट करार दिया जा रहा हो, लेकिन बंद कमरे में हुई इस चर्चा के कई गहरे राजनीतिक निहितार्थ निकाले जा रहे हैं।

‘रामायण’ में मुलाकात के पीछे का असली संदेश

लखनऊ में हुई इस अहम बैठक के बाद सत्ता के गलियारों में चर्चाएं तेज हैं कि क्या यह सिर्फ एक सामान्य शिष्टाचार था या फिर पर्दे के पीछे 2027 के महासमर की पटकथा लिखी जा रही है। राजा भैया उत्तर प्रदेश की सियासत में लंबे समय से एक निर्दलीय और मजबूत ताकत के रूप में जाने जाते रहे हैं, खासकर प्रतापगढ़ और कुंडा के इलाके में उनका सियासी रसूख किसी से छिपा नहीं है। 2024 के लोकसभा चुनावों में अपेक्षित परिणाम न मिलने के बाद बीजेपी राज्य में नए और मजबूत सामाजिक-क्षेत्रीय समीकरणों को साधने की जुगत में लगी है, और ऐसे में राजा भैया के दर पर प्रदेश अध्यक्ष की आमद को बेहद अहम माना जा रहा है।

एमएलसी चुनाव और प्रतापगढ़ का पेचीदा गणित

इस मुलाकात का सीधा संबंध आगामी विधान परिषद (एमएलसी) की 11 सीटों पर 23 अक्टूबर को होने वाले मतदान से भी जोड़कर देखा जा रहा है। लखनऊ, वाराणसी और गोरखपुर जैसी महत्वपूर्ण स्नातक और शिक्षक सीटों पर भारतीय जनता पार्टी की साख दांव पर लगी है। लखनऊ स्नातक सीट पर समाजवादी पार्टी ने कांति सिंह को चुनावी मैदान में उतारा है, जो प्रतापगढ़ से सपा सांसद एसपी सिंह पटेल की धर्मपत्नी हैं। प्रतापगढ़ की सियासत में राजा भैया का दखल हमेशा निर्णायक रहा है। ऐसे में सपा के बढ़ते प्रभाव को रोकने और लखनऊ व आसपास के इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए बीजेपी राजा भैया के प्रभाव का सहारा लेने की रणनीति पर काम करती दिख रही है।

बीजेपी के लिए क्यों जरूरी हैं राजा भैया?

राजा भैया केवल जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के मुखिया ही नहीं हैं, बल्कि कुंडा विधानसभा क्षेत्र से लगातार सात बार जीत दर्ज करने वाले अजेय चेहरा भी रहे हैं। कुंडा के साथ-साथ पड़ोसी बाबागंज सीट पर भी उनके समर्थित उम्मीदवारों का कब्जा रहा है। 2024 के आम चुनाव में कौशांबी सीट पर राजा भैया ने सपा उम्मीदवार पुष्पेंद्र सरोज का समर्थन किया था, जिसका खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ा था। अब पार्टी 2027 के रण से पहले अपने पुराने नुकसान की भरपाई करना चाहती है। राजा भैया को साथ लेकर चलने से बीजेपी न सिर्फ कुंडा और बाबागंज बल्कि पूरे प्रतापगढ़ मंडल में अपने वोट बैंक को मजबूती दे सकती है।

क्या राजा भैया को भी है नए सियासी साथी की तलाश?

सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि राजा भैया के लिए भी यह वक्त अपनी जमीन को महफूज रखने का है। 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने गुलशन यादव को प्रत्याशी बनाकर कुंडा की लड़ाई को अप्रत्याशित रूप से कड़ा कर दिया था। इसके अलावा अखिलेश यादव की पार्टी लगातार राजा भैया के पुराने सहयोगियों और सिपहसालारों को अपने पाले में खींचने में जुटी है। अपने अभेद्य किले में सपा की इस सेंधमारी का मुकाबला करने के लिए राजा भैया को भी सत्ताधारी दल के साथ एक संतुलित तालमेल की दरकार महसूस हो सकती है, ताकि क्षेत्रीय प्रभाव पर कोई आंच न आए।

बयानों के बीच छिपी भविष्य की तस्वीर

मुलाकात के बाद बीजेपी प्रवक्ता दिनेश प्रताप सिंह ने इसे एक सहज और सकारात्मक शिष्टाचार मुलाकात बताते हुए किसी औपचारिक गठबंधन की बात से इनकार किया है। उधर, समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अनुराग भदौरिया ने तंज कसते हुए कहा कि सपा का गठबंधन जनता के साथ है और ऐसी मुलाकातों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। दोनों खेमों की बयानबाजी के बावजूद सियासी पंडित मानते हैं कि राजनीति में कोई भी कदम बिना नफे-नुकसान के नहीं उठाया जाता। अब देखना दिलचस्प होगा कि यह मुलाकात सिर्फ चाय पर चर्चा बनकर रह जाती है या आने वाले दिनों में किसी बड़े चुनावी समझौते की नींव साबित होती है।

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