
वॉशिंगटन/नई दिल्ली: अमेरिका में स्थायी निवास यानी ‘ग्रीन कार्ड’ की आस लगाए बैठे भारतीय आईटी पेशेवरों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है। अमेरिकी सरकार ने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), इंफोसिस, विप्रो, एचसीएलटेक (HCLTech), कॉग्निजेंट, कैपजेमिनी, माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (PERM) प्रक्रिया से तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि इन दिग्गज कंपनियों ने विदेशी कर्मचारियों को नौकरी पर रखने के लिए वर्क वीजा और भर्ती नियमों का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया है। इस कड़े फैसले के बाद इन कंपनियों से जुड़े न तो नए PERM आवेदन स्वीकार किए जाएंगे और न ही पहले से लंबित फाइलों पर कोई कार्रवाई होगी। वर्ष 2009 से अब तक इन कंपनियों को एक लाख से अधिक लेबर सर्टिफिकेशन मिल चुके हैं, लेकिन ताजा निलंबन से लाखों विदेशी कामगारों की अमेरिका में स्थायी रूप से बसने की योजनाएं अधर में लटक गई हैं।
क्या है PERM प्रक्रिया और ग्रीन कार्ड के लिए यह क्यों है जरूरी? पीईआरएम (प्रोग्राम इलेक्ट्रॉनिक रिव्यू मैनेजमेंट) रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड हासिल करने की पहली और सबसे अनिवार्य कानूनी सीढ़ी है। इसके तहत अमेरिकी नियोक्ता को श्रम विभाग के समक्ष यह प्रमाणित करना पड़ता है कि जिस पद पर वह विदेशी पेशेवर को रखना चाहता है, उसके लिए योग्य और इच्छुक अमेरिकी नागरिक उपलब्ध नहीं हैं। साथ ही यह भी साबित करना अनिवार्य होता है कि विदेशी नागरिक की नियुक्ति से स्थानीय अमेरिकी कामगारों के वेतन और कार्य स्थितियों पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। श्रम विभाग की मंजूरी के बाद ही कंपनी ग्रीन कार्ड के अगले चरणों (I-140 और I-485) की प्रक्रिया शुरू कर सकती है। अब इन 8 टेक कंपनियों पर रोक लगने से यह पूरी प्रक्रिया ठप पड़ गई है।
कंपनियों पर अमेरिकी सरकार का शिकंजा और वीजा दुरुपयोग के आरोप अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, यह कार्रवाई स्थानीय प्रतिभाओं के हितों और नौकरियों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर की गई है। सरकार का तर्क है कि कंपनियां वीजा सिस्टम की कमियों का फायदा उठाकर कम लागत में विदेशी कर्मियों को नियुक्त करती रही हैं, जिससे अमेरिकी पेशेवरों के वेतन और अवसरों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2009 से इन 8 कंपनियों ने करीब 30 लाख विदेशी कर्मचारियों के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू की थी, जिसके एवज में उन्हें 2.30 लाख से ज्यादा H-1B वीजा स्वीकृतियां और एक लाख से अधिक स्थायी लेबर सर्टिफिकेशन मिले।
कर्मचारियों और उनके परिवारों के सामने खड़ा हुआ बड़ा संकट PERM प्रक्रिया रुकने से कर्मचारियों का मौजूदा H-1B वीजा तुरंत रद्द नहीं होता, लेकिन संकट उनकी भविष्य की वैधता को लेकर है। H-1B वीजा पर अधिकतम 6 साल तक काम किया जा सकता है। 6 साल की मियाद के बाद अमेरिका में रुकने और वीजा विस्तार पाने के लिए PERM का स्वीकृत होना आवश्यक होता है। जिन कर्मचारियों का 6 साल का कोटा खत्म होने की कगार पर है, उन्हें या तो तुरंत अन्य कंपनी में ट्रांसफर लेना होगा या फिर अमेरिका छोड़ना पड़ेगा। कंपनी बदलने की स्थिति में भी नए नियोक्ता के साथ PERM की लंबी प्रक्रिया नए सिरे से शुरू करनी होगी। पहले से 12 से 15 साल की प्रतीक्षा सूची झेल रहे भारतीयों के लिए यह रोक उनके इंतजार को और अधिक अनिश्चित बना देगी, क्योंकि सरकार ने इस निलंबन की कोई अंतिम समयसीमा तय नहीं की है।
10 लाख भारतीय कतार में: बैकलाग का भयावह गणित नेशनल फाउंडेशन फॉर अमेरिकन पॉलिसी (NFAP) की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में करीब 10 लाख भारतीय रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड के इंतजार में हैं। दिसंबर 2025 तक लंबित कुल मामलों में अकेले भारतीयों की हिस्सेदारी लगभग 79 प्रतिशत थी। देशों के आधार पर तय 7 प्रतिशत के ‘कंट्री कैप’ के चलते भारतीयों पर इसका सबसे गंभीर असर पड़ रहा है। NFAP के 2026 के अनुमानों के मुताबिक, यदि किसी कुशल भारतीय पेशेवर ने जनवरी 2026 में प्रक्रिया शुरू की है, तो उसे EB-1 श्रेणी में 4 से 5 साल, EB-3 श्रेणी में 38 साल और EB-2 श्रेणी में करीब 179 साल तक का इंतजार करना पड़ सकता है। वीजा बुलेटिन के अनुसार, सितंबर 2026 में भारतीयों के लिए EB-2 श्रेणी पूरी तरह अनुपलब्ध थी, जबकि अक्टूबर 2026 के नए बुलेटिन में 1 नवंबर 2013 से पहले की प्राथमिकता तिथि वालों को ही मौका मिल सका है। वहीं EB-3 में 1 जनवरी 2014 से पहले के आवेदनों की ही बारी आ रही है।
करियर, निवेश और पारिवारिक योजनाओं पर अनिश्चितता का साया ग्रीन कार्ड प्रक्रिया में रुकावट आने से भारतीय पेशेवरों के लिए नौकरी बदलना, पदोन्नति हासिल करना और लंबी अवधि की योजनाएं बनाना बेहद जटिल हो गया है। घर खरीदने, बच्चों की उच्च शिक्षा और रिटायरमेंट प्लानिंग जैसे अहम फैसले अनिश्चितता के घेरे में आ गए हैं। इधर टेक कंपनियों को भी अपनी हायरिंग नीतियों, थर्ड-पार्टी वेंडर मॉडल्स और ऑफशोर तैनाती की रणनीतियों में बड़े बदलाव करने होंगे। कानूनी अनिश्चितता के चलते कई कुशल भारतीय प्रोफेशनल्स अब कनाडा, यूरोप या ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों का रुख कर सकते हैं, जहां स्थायी निवास के नियम अपेक्षाकृत सरल हैं, जबकि कई पेशेवरों को स्वदेश लौटने का विकल्प चुनना पड़ सकता है।
H-1B वीजा, PERM और ग्रीन कार्ड के अंतर को ऐसे समझें H-1B वीजा विदेशी कुशल कामगारों को अमेरिका में एक निश्चित अवधि के लिए अस्थायी तौर पर काम करने की कानूनी अनुमति देता है। वहीं, PERM रोजगार के जरिए स्थायी निवास (ग्रीन कार्ड) पाने की कानूनी प्रक्रिया का सबसे पहला आधिकारिक चरण है। PERM की मंजूरी मिलने और उसके बाद के चरण पूरे होने पर ही व्यक्ति को ग्रीन कार्ड यानी स्थायी नागरिकता का दर्जा मिलता है। अमेरिकी प्रशासन ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस फैसले से कुल कितने भारतीय कर्मचारी सीधे तौर पर प्रभावित होंगे और कंपनियों पर यह पाबंदी कितने समय तक प्रभावी रहेगी।
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