
पश्चिम बंगाल की राजनीति में शुक्रवार का घटनाक्रम किसी बड़े सियासी ड्रामे से कम नहीं रहा, जहां ममता बनर्जी गुट को एक के बाद एक कई बड़े झटके लगे। निर्वाचन आयोग द्वारा मूल पार्टी नाम ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और पारंपरिक ‘फूल-घास’ चुनाव चिह्न फ्रीज किए जाने के बाद नंदीग्राम के सियासी अखाड़े में बड़ा उलटफेर देखने को मिला। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से मुलाकात के तुरंत बाद पार्टी प्रत्याशी संचिता प्रधान डे ने अपना पर्चा वापस खींच लिया। ममता गुट ने जब डैमेज कंट्रोल करते हुए कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को समर्थन देने की घोषणा की, तो कुछ ही घंटों में पुलिस ने मिलन प्रधान को एक पुराने मामले में गिरफ्तार कर लिया। बैक टू बैक लगे इन झटकों के बाद अब ममता खेमे ने देश की शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है।
सिंबल जब्ती और बागी विधायकों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दो याचिकाएं
पार्टी में टूट और सिंबल पर लगी रोक के खिलाफ ममता बनर्जी गुट ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष दो अलग-अलग याचिकाएं दायर कर फौरी राहत की गुहार लगाई है। पहली याचिका में चुनाव आयोग के उस अंतरिम आदेश को चुनौती दी गई है, जिसके जरिए पार्टी के नाम और ऐतिहासिक चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी गई। ममता गुट का आरोप है कि आयोग ने संगठन के मूल कैडर और जमीनी ढांचे को दरकिनार कर बागी गुट के पक्ष को तरजीह दी। दूसरी याचिका में विधानसभा अध्यक्ष द्वारा 10 बागी विधायकों की अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला लटकाए रखने का मुद्दा उठाया गया है। खेमे का तर्क है कि जब तक इन 10 विधायकों की सदस्यता पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक उनके समर्थन के आधार पर पार्टी नाम और सिंबल का बंटवारा करना असंवैधानिक है। शीर्ष अदालत 21 सितंबर 2026 को इन याचिकाओं पर सुनवाई कर सकती है।
नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी और 10 बागी विधायकों पर आर-पार
ममता गुट के वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी समेत 10 विधायकों को दल-बदल कानून के तहत अयोग्य घोषित करने की मांग उठाई है। विधानसभा सचिवालय ने ऋतब्रत बनर्जी, फिरहाद हकीम, अरूप राय, संदीपन साहा, अखरुज्जमान अंसारी, शिउली साहा, सबीना यास्मिन, बिप्लब मित्रा, जावेद खान और रथिन घोष को नोटिस थमाकर एक हफ्ते में जवाब तलब किया है। विवाद विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर भी गरमाया हुआ है। ममता खेमा शोभनदेव चट्टोपाध्याय को इस पद पर देखना चाहता था, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष ने ऋतब्रत बनर्जी के नाम पर मुहर लगा दी थी। हाईकोर्ट से तुरंत राहत न मिलने के बाद अब यह विवाद अयोग्यता की बड़ी कानूनी जंग में तब्दील हो चुका है।
नंदीग्राम का नाटकीय घटनाक्रम: नबन्ना में मुलाकात और अचानक नाम वापसी
आगामी 6 अक्टूबर को नंदीग्राम विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव से ठीक पहले जमीन पर मुकाबला अप्रत्याशित मोड़ ले चुका है। चुनाव आयोग ने दिन में ममता गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न आवंटित किया था, लेकिन कुछ ही देर में खेल पलट गया। ममता गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे अपने पति सत्यजीत के साथ सीधे राज्य सचिवालय नबन्ना पहुंचीं और मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से मुलाकात कर अचानक अपना नामांकन वापस ले लिया। इस चौंकाने वाले फैसले से ममता खेमे का खुद का उम्मीदवार ही मैदान से बाहर हो गया।
कांग्रेस प्रत्याशी को समर्थन और चंद घंटों में गिरफ्तारी पर संग्राम
प्रत्याशी के हटने के बाद ममता बनर्जी ने ‘इंडिया’ ब्लॉक की एकता का हवाला देते हुए कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को खुला समर्थन देने का ऐलान कर दिया। लेकिन यह सियासी दांव टिक पाता, उससे पहले ही बंगाल पुलिस ने 2007 के नंदीग्राम भूमि आंदोलन से जुड़े एक पुराने हत्या केस के लंबित वारंट के तहत मिलन प्रधान को धर दबोचा। इस गिरफ्तारी के बाद विपक्ष हमलावर हो गया। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर तीखा हमला बोलते हुए इसे राजनीतिक प्रतिशोध और लोकतंत्र की हत्या करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा मुकाबला लड़ने के बजाय चुनावी मैदान ही खत्म करना चाहती है। वहीं भाजपा ने पलटवार करते हुए इसे कानून की सामान्य प्रक्रिया बताया और विपक्ष पर संवैधानिक संस्थाओं के काम में बेवजह राजनीति तलाशने का आरोप मढ़ा।
28 साल पुरानी पहचान और साख की सबसे बड़ी परीक्षा
साल 1998 में गठित तृणमूल कांग्रेस के 28 साल के सफर में यह पहला मौका है जब उसके अपने ही नाम और ‘जोड़ा फूल’ पहचान को लेकर इतनी गंभीर दरार पड़ी है। आयोग ने फिलहाल इसे अंतरिम व्यवस्था के तहत फ्रीज किया है ताकि 6 अक्टूबर के उपचुनाव प्रभावित न हों। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या मिलन प्रधान को अदालत से राहत मिलकर वह मैदान में डटे रह पाते हैं और 21 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट से ममता गुट को क्या कानूनी संजीवनी मिलती है।
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