Thursday , 1 October 2026

बंगाल की सियासत में भूचाल : चुनाव आयोग ने फ्रीज किया तृणमूल कांग्रेस का नाम और सिंबल, विपक्ष का तीखा वार—’पार्टी कोई प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नहीं’

कोलकाता ब्यूरो पश्चिम बंगाल की सियासत में उस वक्त बड़ा उबाल आ गया, जब चुनाव आयोग ने एक ऐतिहासिक अंतरिम आदेश जारी करते हुए ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के नाम और उसके चुनाव चिह्न को तत्काल प्रभाव से फ्रीज कर दिया। आयोग के इस कड़े कदम के बाद राज्य की राजनीतिक हवा पूरी तरह बदल गई है। इस बड़े घटनाक्रम पर पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने कड़ा प्रहार करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने दो टूक कहा कि चुनाव आयोग के फैसले ने साफ कर दिया है कि किसी भी राजनीतिक दल को निजी बपौती या प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह नहीं चलाया जा सकता और न ही वंशवादी उत्तराधिकार के दम पर लोकतंत्र को हांका जा सकता है।

‘लोकतंत्र में तानाशाही की कोई जगह नहीं’: विपक्ष का कड़ा प्रहार पार्टी के नाम और सिंबल पर छिड़े घमासान के बीच सामने आए इस फैसले को लेकर ऋतब्रत बनर्जी ने बताया कि यह खबर नेताओं के लिए बेहद चौंकाने वाली रही। उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जैसे ही वे विमान से उतरे, उन्हें सूचना मिली कि पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न दोनों फ्रीज हो चुके हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह आदेश तानाशाही रवैये पर एक करारा तमाचा है, क्योंकि लोकतंत्र में किसी भी किस्म की मनमानी या तानाशाही के लिए कोई स्थान नहीं होता।

‘राजनीतिक दल कोई प्राइवेट कंपनी नहीं, जिसका वारिस तय हो’ ऋतब्रत बनर्जी ने परिवारवाद की राजनीति पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश ने यह साबित कर दिया है कि राजनीति में वंशवाद की दाल अब नहीं गलने वाली। उन्होंने कहा कि सिंबल और नाम पर चल रही खींचतान ने पर्दे के पीछे की सच्चाई उजागर कर दी है। कोई भी राजनीतिक पार्टी किसी की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नहीं होती और न ही किसी दल का कोई निजी वारिस हो सकता है। आयोग के फैसले ने यह पूरी तरह साफ कर दिया है कि संगठन जनता और नियमों से चलते हैं, न कि पारिवारिक उत्तराधिकार से।

उपचुनाव पर पड़ेगा सीधा असर, दोनों गुटों को चुनना होगा नया नाम और निशान चुनाव आयोग का यह अंतरिम आदेश ऐसे संवेदनशील समय में आया है जब राज्य की दो अहम विधानसभा सीटों—नंदीग्राम और रेजीनगर में 6 अक्तूबर को उपचुनाव होने हैं। आयोग के इस फैसले का सीधा असर इन दोनों सीटों के चुनावी समीकरणों पर पड़ना तय माना जा रहा है। आयोग ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि जब तक विवाद का अंतिम निपटारा नहीं हो जाता, तब तक दोनों विरोधी गुटों को अपने लिए नए नाम और नए चुनाव चिह्न का चयन करना होगा।

चुनाव आयोग ने अपने आदेश में क्या कहा? आयोग ने उपलब्ध सभी साक्ष्यों, दस्तावेजों और दावों की बारीकी से समीक्षा करने के बाद पाया कि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस में इस वक्त दो स्पष्ट विरोधी खेमे बन चुके हैं। दोनों ही गुट खुद को असली पार्टी बताते हुए संगठन और सिंबल पर अपना-अपना दावा ठोक रहे हैं। आयोग ने अपने आदेश में दर्ज किया कि एक खेमे की अगुवाई ममता बनर्जी कर रही हैं, जबकि दूसरे गुट का नेतृत्व अरूप रॉय के हाथों में है। दोनों धड़ों द्वारा पार्टी पर समानांतर दावा किए जाने के चलते चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा 15 के तहत यह अंतरिम कदम उठाना आवश्यक हो गया था, ताकि निष्पक्षता बनी रहे।

 

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