
पंजाब की सियासत इस समय एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी नजर आ रही है। मुकाबला अब महज राजनीतिक दलों के बीच सत्ता हथियाने का नहीं, बल्कि दशकों पुरानी सियासी रियासतों और उभरते नए चेहरों के बीच वर्चस्व की सीधी जंग बन चुका है। 2022 के विधानसभा चुनाव में जो सियासी जलजला आया था, उसने राज्य के पारंपरिक राजनीतिक ढांचे की नींव हिलाकर रख दी थी। अब सवाल यह है कि 2027 में क्या दिग्गज परिवार अपनी खोई हुई साख बचा पाएंगे या बदलाव की यह लहर पूरी तरह स्थापित हो जाएगी।
2022 का चुनावी भूचाल: जब ढह गए दिग्गजों के सियासी किले साल 2022 का जनादेश पंजाब की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। आम आदमी पार्टी ने रिकॉर्ड 92 सीटें जीतकर कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और भाजपा जैसी स्थापित ताकतों को हाशिये पर धकेल दिया। इस चुनाव में पांच बार के मुख्यमंत्री रहे प्रकाश सिंह बादल, अकाली दल प्रमुख सुखबीर सिंह बादल, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और नवजोत सिंह सिद्धू जैसे दिग्गजों को नए चेहरों के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा। अमृतसर ईस्ट जैसी हाई-प्रोफाइल सीट पर पहली बार चुनाव लड़ रहीं आप प्रत्याशी जीवनज्योत कौर ने बिक्रम सिंह मजीठिया को पराजित कर यह साबित कर दिया कि जनता अब केवल बड़े पारिवारिक नामों पर वोट देने के मूड में नहीं है।
अकाली दल के सामने पंथक आधार और वजूद बचाने की जंग 2022 में महज तीन सीटों पर सिमट जाने के बाद शिरोमणि अकाली दल और बादल परिवार के लिए 2027 का चुनाव करो या मरो की लड़ाई जैसा है। सुखबीर सिंह बादल के सामने न सिर्फ पार्टी का अस्तित्व बचाए रखने की चुनौती है, बल्कि ग्रामीण और पारंपरिक पंथक वोट बैंक को दोबारा अपने पाले में लाने का भारी दबाव भी है। हाल के दिनों में पार्टी की बढ़ती सक्रियता दिखाती है कि बादल परिवार अपने पारंपरिक प्रभाव को दोबारा जिंदा करने के लिए हर मुमकिन सियासी दांव आजमाने को तैयार है।
कांग्रेस की दुविधा: पुरानी विरासत और नए समीकरणों के बीच संतुलन कांग्रेस के लिए भी 2027 की राह आसान नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी भले ही 2022 में दोनों विधानसभा सीटों से चुनाव हार गए थे, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों ने कांग्रेस को राज्य में नई संजीवनी दी है। अब पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह स्थापित सियासी घरानों के प्रभाव और उभरते नए युवा नेतृत्व के बीच कैसे तालमेल बिठाती है, ताकि बदलते सामाजिक और जातीय समीकरणों को साधा जा सके।
भाजपा भी सियासी घरानों और तजुर्बे के सहारे मैदान में भारतीय जनता पार्टी भी पंजाब में अपने पांव पसारने के लिए पुराने सियासी परिवारों और अनुभवी चेहरों पर दांव लगाती दिख रही है। सुनील जाखड़ के बाद पार्टी संगठन में केवल सिंह ढिल्लों जैसे स्थापित नेताओं की भूमिका को आगे बढ़ाया गया है। इसी तरह पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के परिवार से आने वाले रवनीत सिंह बिट्टू भी भाजपा के मंच से अपनी सियासी जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। हालांकि, सवाल यही है कि क्या दूसरे दलों से आए स्थापित चेहरों की पारिवारिक पहचान भाजपा के झंडे तले उतनी ही असरदार साबित होगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब का मतदाता अब अतीत की विरासत से आगे बढ़कर वर्तमान की जवाबदेही, जमीनी पकड़ और ठोस काम को प्राथमिकता दे रहा है। 2027 का चुनाव यह तय करेगा कि पुरानी सियासी हवेलियों की चमक लौटेगी या पंजाब नए राजनीतिक विकल्पों को ही अपना भविष्य मान चुका है।
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