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निठारी कांड: जल्लाद तैयार था, फंदा भी रेडी… 12 साल पहले ऐसे टली थी सुरेंद्र कोली की फांसी

देश के सबसे खौफनाक और चर्चित निठारी हत्याकांड का मुख्य चेहरा रहे सुरेंद्र कोली की जिंदगी का खौफनाक अंत हो गया। साल 2014 में मेरठ जेल में जिस फंदे से वह ऐन वक्त पर बच निकला था, आखिरकार करीब 12 साल बाद मौत ने उसे हरिद्वार में उसी फंदे के जरिए आगोश में ले लिया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सभी आरोपों से बरी किए जाने के बाद हरिद्वार में गुमनामी की जिंदगी बिताते हुए चाय की दुकान चला रहे कोली का शव शुक्रवार, 18 सितंबर को उसकी दुकान में फंदे से लटकता मिला। देश की न्याय व्यवस्था, लंबी कानूनी लड़ाइयों और 19 साल की जेल काटने के बाद रिहा हुए कोली का इस तरह अंत होना हर किसी को चौंका रहा है।

D-5 कोठी का नौकर, जो बना भारत के सबसे बड़े हत्याकांड का चेहरा

दिसंबर 2006 में जब नोएडा के सेक्टर-31 स्थित निठारी गांव के D-5 बंगले के पास नाले से नरकंकाल, बच्चों की खोपड़ियां और कपड़े मिले थे, तो पूरा देश दहल उठा था। इस बंगले के मालिक मोनिंदर सिंह पंधेर के यहां बतौर घरेलू नौकर काम करने वाले सुरेंद्र कोली को मुख्य आरोपी बनाया गया। कोली पर नाबालिग बच्चियों को फुसलाकर कोठी में लाने, उनसे दरिंदगी करने, हत्या कर शव के टुकड़े नाले में फेंकने के घिनौने आरोप लगे। फरवरी 2009 में गाजियाबाद की सीबीआई अदालत ने कोली और पंधेर दोनों को फांसी की सजा सुनाई। बाद में हाई कोर्ट ने पंधेर को कुछ मामलों में राहत दी, लेकिन कोली को निठारी के 13 अलग-अलग मुकदमों में मौत की सजा सुनाई गई।

आधी रात को खुली थी सुप्रीम कोर्ट की चौखट, टली थी फांसी

साल 2014 में सुरेंद्र कोली मौत के मुहाने पर खड़ा था। दया याचिका खारिज होने के बाद उसे मेरठ जेल शिफ्ट कर दिया गया था और 8 सितंबर की सुबह उसे फांसी देने के लिए जल्लाद ने फंदा भी परख लिया था। फांसी से ठीक कुछ घंटे पहले, 7 सितंबर की देर रात वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। जस्टिस ए.आर. दवे और जस्टिस एच.एल. दत्त की आपातकालीन पीठ ने रात 1 बजे जज के आवास पर सुनवाई कर फांसी पर रोक लगा दी। बाद में जनवरी 2015 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दया याचिका के निस्तारण में देरी के आधार पर उसकी फांसी को उम्रकैद में तब्दील कर दिया, हालांकि अन्य मामलों के चलते वह जेल में ही बंद रहा।

हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक कैसे ढहा जांच का ढांचा

अक्टूबर 2023 में इस मामले ने तब करवट ली, जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कोली को 12 मामलों में बरी कर दिया। कोर्ट ने पाया कि कोली का कबूलनामा लगातार 60 दिनों की अवैध पुलिस कस्टडी और प्रताड़ना के बाद लिया गया था, इसलिए वह कानूनी रूप से अमान्य है। इसके अलावा, D-5 बंगले के अंदर खून के ऐसे कोई ठोस निशान या वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं मिले जो नृशंस कत्ल की पुष्टि करते हों। इसके बाद 11 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस बी.आर. गवई, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने अंतिम मामले में भी सजा रद्द करते हुए इसे न्याय की विफलता करार दिया और रिहाई का आदेश दिया।

19 साल बाद जेल से रिहाई और गुमनामी में फंदे पर झूल गई जिंदगी

12 नवंबर 2025 को ग्रेटर नोएडा की कासना जेल से 19 साल बाद बाहर आने के बाद कोली ने अपनी पुरानी पहचान से दूर जाने का फैसला किया। वह उत्तराखंड के हरिद्वार पहुंच गया, जहां वह एक छोटी सी चाय की दुकान चलाकर आम जिंदगी जीने की कोशिश कर रहा था। जिस चेहरे को कभी देश भर की मीडिया और लोग क्रूरता का पर्याय मानते थे, वह हरिद्वार में चुपचाप चाय बेच रहा था। शुक्रवार 18 सितंबर को जब उसकी चाय की दुकान में उसका शव फंदे से लटकता मिला, तो पुलिस महकमे से लेकर आम जनता तक में सनसनी फैल गई।

 

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