
भारत अपनी ऐतिहासिक और देश की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना के लिए तैयार है। 2027 में होने वाली इस राष्ट्रीय कवायद का दूसरा चरण यानी जनसंख्या गणना (Population Enumeration) कई बड़े और दूरगामी बदलावों के साथ सामने आएगा। इस बार नागरिकों से कुल 40 सवाल पूछे जाएंगे, जो 2011 की जनगणना के 29 सवालों की तुलना में 11 अधिक हैं। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि साल 1931 के बाद पहली बार अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के अतिरिक्त अन्य जातियों की भी विस्तृत गिनती की जाएगी।

जनवरी से मार्च 2027: यह रहेगा पूरा टाइमटेबल
जनसंख्या गणना के लिए नागरिकों को खुद ऑनलाइन विवरण दर्ज करने की सहूलियत दी जाएगी। 10 जनवरी से 24 जनवरी 2027 के बीच सेल्फ एन्यूमरेशन की सुविधा मिलेगी, जिसमें लोग सीधे आधिकारिक पोर्टल पर अपना डेटा फीड कर सकेंगे। इसके बाद 25 जनवरी से 28 फरवरी 2027 तक प्रगणक (एन्यूमरेटर) घर-घर जाकर सत्यापन और शेष जानकारी दर्ज करेंगे। पूरी गणना की संदर्भ तिथि (रेफरेंस डेट) 1 मार्च 2027 की रात 12 बजे तय की गई है, जिसके उपरांत 1 से 5 मार्च तक छूटे हुए लोगों के नाम जोड़ने और आवश्यक संशोधन का कार्य चलेगा।
चुनावी राज्यों और बर्फीले क्षेत्रों के लिए विशेष योजना, मणिपुर पर संशय
विधानसभा चुनावों के मद्देनजर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और पंजाब जैसे राज्यों में घर-घर जाकर गणना का कार्य समय से पहले शुरू करने की योजना बनाई जा रही है। वहीं लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के भारी बर्फबारी वाले इलाकों के लिए अलग समय-सारणी तैयार की गई है। दूसरी तरफ, मणिपुर में एनआरसी प्रक्रिया पहले पूरी करने की मांग के चलते वहां जनगणना कार्यक्रम को फिलहाल स्थगित रखा गया है।
40 सवाल और 11 नई जानकारियां: क्या-क्या पूछा जाएगा?
इस बार प्रगणक को प्रति व्यक्ति करीब 20 से 25 मिनट का समय देना होगा, क्योंकि एक एन्यूमरेशन ब्लॉक में 750 से 800 लोग शामिल हैं। पूछे जाने वाले प्रमुख बिंदुओं में निम्नलिखित शामिल हैं:
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जाति और धर्म: एससी/एसटी के अलावा अन्य जातियों का विस्तार और धार्मिक पृष्ठभूमि।
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पारिवारिक व व्यक्तिगत पहचान: माता-पिता और जीवनसाथी का नाम, माता-पिता की जन्मतिथि व जन्मस्थान, घोषित राष्ट्रीयता और स्थायी आवासीय पता।
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शिक्षा और तकनीक: उच्चतम शैक्षणिक योग्यता, अध्ययन का विषय/स्ट्रीम और डिजिटल साक्षरता का स्तर।
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पहचान दस्तावेज व वित्तीय ब्योरा: कुल बैंक खातों की संख्या, मोबाइल नंबर, पहचान पत्र और वोटर आईडी नंबर (पहचान विवरण देना पूर्णतः वैकल्पिक रहेगा)।
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अन्य विवरण: कोविड-19 टीकाकरण का स्थान, भारतीय पासपोर्ट धारकों का पासपोर्ट नंबर और ड्राइविंग लाइसेंस की उपलब्धता।
30 लाख से अधिक कर्मी, हाईटेक मोबाइल ऐप और विशेष प्रशिक्षण
इस महाअभियान के लिए देशभर में करीब 30 से 34 लाख गणना कर्मियों और सुपरवाइजरों को तैनात किया जाएगा। सभी प्रगणकों को टैबलेट और विशेष मोबाइल ऐप के माध्यम से सीधे डिजिटल डेटा दर्ज करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण में विशेष रूप से निर्देश दिए जा रहे हैं कि जाति और धर्म जैसे संवेदनशील विषयों पर बिना किसी बहस, निजी टिप्पणी या विवाद के केवल नागरिकों द्वारा दिए गए उत्तर ही दर्ज किए जाएं।
सेंसस और NPR में अंतर समझना जरूरी
जनगणना का प्राथमिक उद्देश्य जनसंख्या का आकार, शिक्षा, रोजगार, आवास, प्रवास और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के सांख्यिकीय आंकड़े संकलित करना है, जो परिसीमन, बजट आवंटन और कल्याणकारी नीतियों का आधार बनते हैं। इसके विपरीत, नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (NPR) किसी क्षेत्र में छह महीने से रह रहे या अगले छह महीने तक रहने के इच्छुक सामान्य निवासियों का डेटाबेस है, जिसका संबंध पहचान और नागरिकता से होता है। यद्यपि दोनों ही कार्य गृह मंत्रालय के अधीन भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय द्वारा संचालित किए जाते हैं।
डेटा प्राइवेसी और सेंसस एक्ट की कानूनी दीवार
जनगणना डेटा की गोपनीयता को लेकर सेंसस एक्ट, 1948 की धारा 15 स्पष्ट रूप से सुरक्षा प्रदान करती है। इस कानून के तहत जनगणना में जुटाई गई किसी भी नागरिक की व्यक्तिगत जानकारी पूरी तरह गोपनीय रहती है। इसे न तो आम जनता के लिए सार्वजनिक किया जा सकता है और न ही अदालती या आपराधिक मामलों में साक्ष्य के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। कानूनी विशेषज्ञों का भी कहना है कि कानून इस डेटा को दूसरी एजेंसियों के साथ साझा करने की अनुमति नहीं देता और इसका उपयोग सिर्फ सांख्यिकीय विश्लेषण तक सीमित रहना चाहिए, निगरानी के लिए नहीं।
11,718 करोड़ का बजट, डिजिटल युग का नया कीर्तिमान
मूल रूप से 2021 में प्रस्तावित यह जनगणना कोरोना महामारी के चलते स्थगित कर दी गई थी। अब केंद्र सरकार ने 2027 की जनगणना के लिए 11,718.24 करोड़ रुपये की वित्तीय स्वीकृति दी है। सेंसस एक्ट, 1948 और सेंसस रूल्स, 1990 के दायरे में होने वाली यह डिजिटल गणना स्वतंत्र भारत के सामाजिक-आर्थिक नियोजन में एक नया मील का पत्थर साबित होगी।
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