
नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के चोरबागान सार्वजनीन दुर्गा पूजा पंडाल में मची भयावह भगदड़ ने एक बार फिर पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है। इस दर्दनाक हादसे में 19 श्रद्धालुओं की असमय मौत हो गई, जबकि दो दर्जन से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। हालांकि, धार्मिक आयोजनों, विशाल मेलों, यात्राओं और स्नान पर्वों पर अनियंत्रित भीड़ के चलते होने वाली ऐसी त्रासदियों का यह कोई पहला मामला नहीं है। बीते वर्षों में देश के अलग-अलग कोनों से आए दिन ऐसे दिल दहला देने वाले वाकये सामने आते रहे हैं, जहां प्रशासनिक लचरता, अफवाहों या बुनियादी ढांचे की नाकामी के चलते सैकड़ों बेकसूर श्रद्धालुओं ने अपनी जान गंवाई है।
महाकुंभ, तिरुमला और हाथरस के वो खौफनाक मंजर
हालिया इतिहास पर नजर डालें तो 29 जनवरी 2025 को प्रयागराज महाकुंभ के दौरान मौनी अमावस्या के पावन स्नान पर मची भगदड़ में 30 श्रद्धालुओं की जान चली गई थी और 60 से ज्यादा घायल हुए थे। इस त्रासदी के कुछ ही दिनों बाद 15 फरवरी 2025 को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर महाकुंभ जाने वाले यात्रियों के भारी जमावड़े के बीच मची भगदड़ में 18 लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी। इसके अलावा 8 जनवरी 2025 को आंध्र प्रदेश के तिरुमला में वैकुंठ द्वार दर्शन के टिकट काउंटरों पर अनियंत्रित भीड़ से छह लोगों ने दम तोड़ दिया था, जबकि 3 मई 2025 को गोवा के शिरगांव स्थित श्री लैराई देवी मंदिर जात्रा में मची भगदड़ में 7 श्रद्धालुओं की मौत और करीब 80 लोग घायल हुए थे। वहीं, 2 जुलाई 2024 को उत्तर प्रदेश के हाथरस में भोले बाबा के सत्संग के समापन पर हुआ भीषण हादसा अब तक के सबसे बड़े हादसों में शुमार है, जहां 100 से अधिक अनुयायियों की जान चली गई थी। 12 अगस्त 2024 को बिहार के बाबा सिद्धनाथ मंदिर में सावन मेले के दौरान मची भगदड़ में सात लोगों की मौत हुई थी और 10 लोग घायल हुए थे।
वैष्णो देवी, इंदौर बावड़ी और गोपालगंज पूजा पंडाल की त्रासदियां
नववर्ष के पहले दिन 1 जनवरी 2022 को जम्मू-कश्मीर स्थित प्रसिद्ध माता वैष्णो देवी धाम में भवन के पास उमड़े भारी जनसैलाब में मची भगदड़ ने 12 श्रद्धालुओं की जान ले ली थी और दर्जनभर लोग घायल हुए थे। 31 मार्च 2023 को मध्य प्रदेश के इंदौर में रामनवमी पर बड़ा हादसा हुआ, जब बेलेश्वर महादेव मंदिर में हवन के दौरान बावड़ी की कमजोर छत धंस गई और 36 श्रद्धालुओं की मौत हो गई। बिहार के गोपालगंज में भी 23 अक्टूबर 2023 को महा नवमी पर राजा दल दुर्गा पूजा पंडाल में भारी भीड़ के बीच मची भगदड़ में एक मासूम बच्चे समेत तीन लोगों ने दम तोड़ा था और 17 घायल हुए थे।
2003 से 2015: मांढरदेवी, चामुंडा देवी, नैना देवी और सबरीमाला के काले पन्ने
धार्मिक आयोजनों में अफवाहों और सुरक्षा खामियों से उपजी त्रासदियों का इतिहास बेहद दर्दनाक रहा है। 27 अगस्त 2003 को महाराष्ट्र के नासिक कुंभ स्नान के दौरान 39 श्रद्धालुओं की मौत हुई थी। 25 जनवरी 2005 को महाराष्ट्र के सतारा स्थित मांढरदेवी मंदिर में कालिका माता यात्रा के दौरान लगी आग और उसके बाद मची भीषण भगदड़ में 340 से अधिक लोग जिंदा दफन हो गए थे। 3 अगस्त 2008 को हिमाचल प्रदेश के विख्यात नैना देवी मंदिर में भूस्खलन और चट्टान खिसकने की अफवाह के चलते मची भगदड़ में 162 श्रद्धालुओं की जान चली गई थी। इसके महज एक महीने बाद 30 सितंबर 2008 को राजस्थान के जोधपुर स्थित मेहरानगढ़ के चामुंडा देवी मंदिर में बम की अफवाह ने 250 श्रद्धालुओं की जान ले ली थी।
4 मार्च 2010 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ स्थित राम जानकी मंदिर (कृपालु जी महाराज आश्रम) में कपड़े और भोजन वितरण के दौरान मची भगदड़ में 63 लोगों की मौत हुई। 14 जनवरी 2011 को मकरविलक्कू उत्सव के दौरान केरल के पुलमेडु में सबरीमाला से लौट रहे 104 अयप्पा भक्तों की मौत एक भीषण सड़क व भगदड़ हादसे में हुई थी। 8 नवंबर 2011 को हरिद्वार के हर की पौड़ी पर मची भगदड़ में 20 लोग काल के गाल में समा गए थे। 19 नवंबर 2012 को पटना में गंगा तट पर छठ पर्व के दौरान अस्थायी बांस का पुल टूटने से 20 श्रद्धालुओं की मौत हुई थी। 13 अक्टूबर 2013 को मध्य प्रदेश के दतिया स्थित रतनगढ़ माता मंदिर में नवरात्रि के दौरान पुल टूटने की अफवाह से 115 लोगों की मौत हो गई थी। 3 अक्टूबर 2014 को पटना के गांधी मैदान में दशहरा रावण दहन के बाद मची भगदड़ में 32 लोगों की जान गई थी, जबकि 14 जुलाई 2015 को आंध्र प्रदेश के राजमहेंद्रवरम में गोदावरी पुष्करम स्नान के दौरान 27 श्रद्धालुओं ने अपनी जान गंवाई थी।
हाल के वर्षों में भी नहीं थमा हादसों का सिलसिला, सबक सीखने की दरकार
बीते कुछ समय में भी ऐसी दुखद घटनाओं का सिलसिला लगातार देखने को मिला है। 1 नवंबर 2025 को आंध्र प्रदेश के कासीबुग्गा स्थित श्री वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर में भगदड़ से नौ लोगों की असमय मृत्यु हुई थी। वहीं, 17 अगस्त 2026 को बिहार के लखीसराय स्थित अशोक धाम मंदिर में सावन माह की भारी भीड़ के बीच मची भगदड़ में सात श्रद्धालुओं की जान चली गई थी। इन तमाम बड़ी त्रासदियों का विश्लेषण बताता है कि कहीं संकरे एंट्री-एग्जिट रास्ते, कहीं सुरक्षा कर्मियों की कमी, तो कहीं अचानक फैली अफवाहें और लचर क्राउड मैनेजमेंट बेकसूरों की जान का दुश्मन बने। आस्था के इन महापर्वों पर श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सख्त मानक संचालन प्रक्रिया (SOP), रियल-टाइम भीड़ निगरानी और आपातकालीन निकास के पुख्ता इंतजाम आज वक्त की सबसे बड़ी मांग हैं।
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