सीतापुर : चीनी मिल शुरू कराने को लेकर खूब बटोरे वोट, संसद तक पहुंचने के बाद भूल गए वादा

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महोली-सीतापुर। जिस चीनी मिल ने अपनी मिठास के दम पर पूरे एशिया में डंका बजाया, आज 25 वर्षो से बंद पड़ी कड़वाहट का घूंट पी रही है। जिसे चलवाने के नाम पर सांसदों ने वोट बटोरे और संसद तक पहुंचे, मगर उसके बाद उन्होंने उसे चलवाने की तो बात दीगर उसका हाल तक जानना उचित नहीं समझा। हम बात कर रहे हैं विधानसभा व कस्बा महोली में स्थित चीनी मिल की, जो वर्ष 1930 में स्थापित हुई थी और इसमें लेमन चूस टाफी बनती थी जिसकी सप्लाई विदेशों तक हुआ करती थी। उसके बाद 1932 में इसमें दि लक्ष्मी शुगर चीनी मिल शुरू हुई। 45 वर्षो तक इसे स्थापित करने वाले सेठ किशोरीलाल ने संचालित किया। पारिवारिक कलह के चलते 1977 में यह सरकार के हाथों में चली गई। इसका अंतिम चक्का 1998 में घूमा था और फिर बंद हो गया। जिसके बाद से यह कभी नहीं चली। हजारों हजार कामगार बेरोजगार हो गए। हर चुनाव में इसे शुरू कराने के वादे करने वाले सफेद खद्दरधारी आते रहे। चीनी मिल शुरू कराने के नाम पर छलते रहे और वोट हासिल करते जनता को ठगते रहे। मगर संसद पहुंचने के बाद फिर चीनी मिल को देखा तक नहीं। आज फिर चुनाव आ गए हैं और चीनी मिल को शुरू कराने का वादा होने लगा है।

सांसदों ने भी जनता से किए झूठे वादे
2008 में सृजित हुई नई लोकसभा धौरहरा जिसमें नवसृजित विधानसभा महोली जो पहले हरगांव विधानसभा के अंतर्गत आती थी मिश्रिख व हरगांव के हिस्से से मिलाकर बनी विधानसभा 145 महोली जिसका पहला कार्यकाल सपा के विधायक अनूप कुमार गुप्ता का रहा और फिर मोदी लहर के चलते यह सीट विधायक शशांक त्रिवेदी के रूप में भाजपा के खाते में चली गई है। 1998 में बंद हुई चीनी मिल विगत कई दशकों में लोकसभा के कई जनप्रतिनिधियों के साथ लगभग 25 वर्षों का कार्यकाल देखा है किंतु सभी जनप्रतिनिधियों ने मिल चलाने का कोरा वायदा करके वोट तो बटोरा परंतु चीनी मिल अपनी वीरानी पर बाट जोहकर अपने अच्छे दिनों की आस में हुए आंसू बहा रही है। राजनेताओं ने भागीरथ वादे तो किए हैं परंतु चीनी मिल के लिए कोई भागीरथ अब तक सामने नहीं आया है।

कस्बे को जिले में अग्रणी स्थान दिलाने वाली लक्ष्मी जी शुगर मिल जब मिल चल रही थी उस समय यहां के सांसद भाजपा के जनार्दन मिश्रा थे उसके बाद सपा के मुख्तार अनीश रहे। उसके बाद में जनार्दन मिश्रा भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर एक बार फिर निर्वाचित हुए और 1999 तथा 2004 के लोकसभा चुनाव में क्षेत्र की जनता ने राजेश वर्मा बहुजन समाज पार्टी की सांसद को गले लगाया जो सीतापुर की इस क्षेत्र के लिए अंतिम लोकसभा रही। उसके बाद 2008 में सृजित हुई नई लोकसभा धौराहरा में पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे जितिन प्रसाद यहां से चुनकर लोकसभा में पहुंचे उन्होंने विकास तो बहुत कराया किंतु उनका भी चीनी मिल के लिए भागीरथ प्रयास कारगर सिद्ध नहीं हो पाया। वर्तमान में भाजपा की सांसद चुनी गई रेखा अरुण वर्मा ने भी वादा करके वोट तो बटोरे परंतु क्षेत्र का हालचाल भी लेने की फुर्सत उनके पास नहीं रही। चीनी मिल जैसी वीरान व्यवस्था को आबाद कराना तो दूर की बात है।

महोली विधानसभा के मुददे
2009 में हुए परिसीमन के बाद गठित हुई महोली विधान सभा सीट का इतिहास बेहद संक्षिप्त है। इस सीट पर वर्ष 2012 में पहली बार विधान सभा के चुनाव हुए। महोली को तहसील का दर्जा मिलना इस क्षेत्र के मतदाताओं की सबसे बड़ी खुशी है। हालांकि यहां की बंद पड़ी चीनी मिल के चालू न हो पाने की पीड़ा यहां के लोगों को आज भी साल रही है। इसके अलावा यहां के बाशिंदों को एक अदद कन्या डिग्री कॉलेज की भी दरकार है। वर्ष 2007 के विधान सभा चुनाव में मिश्रिख विधान सभा सीट से सपा के अनूप गुप्ता और बसपा के गया प्रसाद मिश्र आमने-सामने थे। इस चुनाव में गया प्रसाद मिश्र को महज 3,141 वोटों से शिकस्त का सामना करना पड़ा था। लेकिन पिछले विधानसभा के चुनाव में मिश्रिख सीट आरक्षित हो गई। जिसके चलते यहां के लड़ाकूओं को दूसरा रणक्षेत्र तलाशना पड़ा। जिसके चलते वर्ष 2012 के चुनाव में नवसृजित महोली सीट पर अनूप गुप्ता सपा के टिकट पर चुनाव मैदान में कूद पड़े। इनके मुकाबले हाथी की सवारी छोड़कर गया प्रसाद कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में उतर गये। बसपा ने यहां से महेश चंद्र मिश्रा को और भाजपा ने भानु प्रताप सिंह को अपना प्रत्याशी बनाया। इस बार भी बाजी अनूप गुप्ता के हाथ लगी और उन्हें महोली का पहला विधायक बनने का गौरव हासिल हुआ। इसके बाद 2017 में अनूप गुप्ता हारे और जनता ने भाजपा के शशांक त्रिवेदी को अपना प्रतिनिधि चुना लेकिन चीनी मिल के लिए वह भी कोई प्रयास नहीं कर पाए।