Breaking News
Home / उत्तर प्रदेश / सीतापुर : कोरोना काल में लगा ‘जरदोजी’ के कार्य पर ग्रहण

सीतापुर : कोरोना काल में लगा ‘जरदोजी’ के कार्य पर ग्रहण



80 फीसदी कारखाने हुए बंद, बेरोजगार हुए कारीगर, विदेशों तक होती थी आपूर्ति

नैमिषारण्य-सीतापुर। 2 साल चल रहे कोरोना काल के दौर में छोटे, मझौले व्यवसायों पर बहुत बुरा असर पड़ा है। इस दौरान जहां कई व्यवसाय जहां ठप हो गए हैं। वहीं बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हो गए हैं। इसी कड़ी में कोरोना काल के चलते नैमिषारण्य तीर्थ से सटे औरंगाबाद व आस-पास के गांवों में बड़े पैमाने पर संचालित होने वाला जरदोजी का कारोबार भी करीब 80 फीसदी तक ठप पड़ा हुआ है।

बताते चलें कि औरंगाबाद कस्बा व आस पास के गांवों में लंहगा, चुन्नी, साड़ी, दुपट्टा पर बारीक कढ़ाई कर देश विदेश में जरदोजी कारीगरी की धमक बिखेरने वाले करीब 15 से 20 कारखानें थे इसके अलावा आसपास के गांवों में भी जरदोजी का काम होता है। एक कारखानें में 10 से ज्यादा कारीगर कढ़ाई का काम करते थे जिसमें कारीगर टिकी-कोरा, जरकन-नग, गोटा-दबका लगाकर बनारसी और जयपुरिया लहंगों की कढ़ाई कर चार चांद लगाते हैं। यहां पर कपड़ों पर कढ़ाई का काम होने के बाद राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा समेत कई राज्यों में निर्यात किया जाता है लेकिन कोरोनाकाल के बाद माल की मांग कम होने की वजह से करीब 80 फीसदी कारखाने बंद हो गए है। 8 से 10 कारीगरों वाले कारखानें पूरी तरह से बंद पड़े है जो कारखानें चल भी रहे हैं. उसमें भी काम न के बराबर ही हो रहा रहा है।

कारखानेदार दो या तीन कारीगरों से ही काम करवा रहे हैं। वहीं कुछ कारीगरों ने तो परिवार का पेट पालने के लिए कढ़ाई का काम छोड़ मजदूरी और अन्य काम करने लगे हैं। मौजूदा समय में कढ़ाई का काम एक्का दुक्का कारखानो में ही हो रहा है। ऐसे में जरदोजी के कुशल कारीगरों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। ऐसे में इस विधा से जुड़े कामगारों को विधानसभा चुनाव 2022 में उनकी समस्या को रेखांकित करने के साथ ही आने वाली सरकार से बड़ी उम्मीदे संजोए है। यहां बनने वाला सामान सऊदी अरब, ईरान, ओमान, कुवैत, कजाकिस्तान, बहरीन, मोरक्को, मालदीव, फिलिस्तीन, नाइजीरिया, इंडोनेशिया आदि देशों में भी जाता है।

कारीगरों ने बयां किया दर्द

जरदोजी व्यवसायी आमीर अंसारी बताते हैं कि करीब दस सालों से जरदोजी कारखाना चला रहा हूँ , बीते 2 सालों से माल की सप्लाई दूसरे राज्यों में न होने की वजह से काम बिल्कुल मंदा चल रहा है। कारखाना संचालक , कारीगर आर्थिक तंगी से गुजर रहे है , क्षेत्र में जरदोजी के कारोबार की बेहतरी के लिए भी राजनीतिक दलों को सोचना चाहिए।

जरदोजी व्यवसायी मो. शाकिब अली कहते हैं कि 15 साल से इस व्यवसाय में हूँ , जरदोजी के कारखानों में दो तरह का काम होता था। एक जोधपुरी और दूसरा विदेशी काम होता था। विदेशी काम 15 से 25 हजार रुपये तक का होता था जबकि जोधपुर का हल्का काम होता था. 2500 से 5000 तक का काम होता था. कारखाना के अलावा घरों में भी लोगों को काम देते थे. एक कारीगर 300 से 400 रुपये प्रतिदिन कमा लेते थे. काम न होने की वजह से कारीगर काम छोड़ चुके हैं।

गुलफाम बेग जरदोजी कारीगर कहते हैं कि पहले रोजाना 300 रुपये तक प्रतिदिन कमा लेते थे, लेकिन अब काम नहीं मिल रहा है। तीन माह बाद अब काम मिला है. वो भी 100 से 150 रुपये पीस के हिसाब से काम मिल रहा है. पूरे दिन दो लोग मिलकर काम करते हैं. तब जाकर एक पीस तैयार हो पाता है. घर खर्च चलाना मुश्किल हो गया है। गौतम अर्कवंशी जरदोजी कारीगर बताते हैं कि क्षेत्र में जरदोजी के कारखाने बंद पड़े है , बेहतरी के दौर में जरदोजी के एक कारखाने में करीब 10 से अधिक कारीगर काम करते थे. काम न होने की वजह से वह भी बेरोजगार हो गए है।

Check Also

प्रतापगढ़ : 42 वर्षों से रामपुर खास में फहरा रहा है कांग्रेस का झण्डा

– पिता से विरासत में मिली विधायिकी को बचाना मोना के लिये चुनौती लालगंज, प्रतापगढ़। ...