विधानसभा चुनाव : 1962 में कांग्रेस की करारी हार के बाद इंदिरा गांधी ने पलट दी थी बाजी


– 1967 में कांग्रेस के सभी छह विधान सभा क्षेत्रों में फिर मिली थी जीत

प्रतापगढ़। जिले में वर्ष 1962 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार और जनसंघ को तीन सीटें मिलने के बाद 1967 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने यहां पहुंचकर बाजी पलट दी थी। राजा अजीत प्रताप सिंह से इंदिरा गांधी की मुलाकात के बाद चुनावी समीकरण बदल गए थे और कांग्रेस ने छह सीटों पर जीत हासिल की थी।

वर्ष 1962 के विधानसभा चुनाव में जनसंघ को तीन सीटों पर कामयाबी मिली थी। इससे कांग्रेस को तगड़ा झटका लगा था। तीन सीटों पर मिली करारी हार के बाद प्रतापगढ़ में कांग्रेस की सियासी जमीन खिसकने लगी थी। कांग्रेस इसे पचा नहीं पा रही थी। शहर के प्रमुख व्यवसायी रमाशंकर खंडेलवाल बताते हैं कि 1967 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने के लिए खुद पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी प्रतापगढ़ आईं। इस बार भी माहौल जनसंघ के पक्ष में था, लेकिन चुनाव से ठीक पहले इंदिरा गांधी ने अपने सधे दांव से बाजी पलट दी। कुंडा के डाक बंगले में जनसंघ के सांसद राजा अजीत प्रताप सिंह से पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मुलाकात की। इसके बाद राजा अजीत जनसंघ से इस्तीफा देकर कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्होंने बताया कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने छह सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की और जनसंघ का सूपड़ा साफ हो गया। 1962 के विधानसभा व लोकसभा चुनाव एक साथ हुए थे।

विधानसभा चुनाव में जिले में खाता खोलने के साथ ही जनसंघ ने पट्टी, सदर और कोहंड़ौर की सीट पर जीत दर्ज की। तीनों सीटों पर कांग्रेस को करारी हार मिली। लोकसभा चुनाव में भी प्रतापगढ़ में जनसंघ का डंका बजा था और राजा अजीत प्रताप सिंह सांसद चुने गए थे। रमाशंकर बताते हैं कि वर्ष 1962 के चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी प्रचार करने आए थे। बावजूद इसके कांग्रेस को करारी हार झेलनी पड़ी। कांग्रेस इस हार को भुला नहीं पा रही थी। पार्टी के नेता प्रतापगढ़ में कांग्रेस के सियासी जमीन दरकने से चिंतित थे। 1962 की जीत के बाद 1967 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर जनसंघ के नेता उत्साहित थे। जनसंघ का माहौल भी बना था। चुनाव से पहले अचानक तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी प्रतापगढ़ पहुंचीं और सांसद राजा अजीत प्रताप सिंह से मुलाकात की।

घंटेभर की इस मुलाकात ने जिले के सियासी समीकरण बदल दिए थे। इंदिरा जनसंघ में सेंध लगाने में कामयाब रहीं। उनसे मुलाकात के बाद राजा अजीत प्रताप सिंह कांग्रेस में शामिल हो गए। इसका नतीजा यह रहा कि कांग्रेस ने जिले की कुंडा, बिहार (अब बाबागंज), लक्ष्मणपुर (अब विश्वनाथगंज), रामपुर खास, सदर, पट्टी में ऐतिहासिक जीत दर्ज की। 1967 के विधानसभा चुनाव में कुंडा में कांग्रेस से नियाज हसन, बिहार (अब बाबागंज) से कांग्रेस से रामस्वरूप भारती, लक्ष्मणपुर (अब विश्वनाथगंज) से कांग्रेस से रामनरेश शुक्ला, सदर से कांग्रेस के राजा अजीत प्रताप सिंह, रामपुर खास से कांग्रेस के रामअंजोर मिश्र, पट्टी से कांग्रेस के रामकिंकर व बीरापुर से एसएसपी से रामदेव दूबे विधायक बने थे। उसके बाद कांग्रेस ने 1969 व 1974 में भी अपना परचम लहराया। उसके बाद वर्ष 1991 में फिर भाजपा लहर में ब्रजेश शर्मा, 2002 में हरिप्रताप सिंह, 2017 में संगम लाल गुप्ता व 2019 के उपचुनाव में राजकुमार पाल चुनाव जीते हैं। समाजवादी पार्टी में 1993 में लाल बहादुर सिंह, 1996 में सीएन सिंह, 2012 में नागेन्द्र कुमार सिंह मुन्ना यादव चुनाव जीत चुके हैं। बसपा के संजय तिवारी वर्ष 2007 में चुनाव जीते थे।

पहली बाद अद का 2000 में खुला था खाता

प्रतापगढ़। वर्ष 2000 में प्रदेश का पहला अपना दल प्रत्याशी हाजी मुन्ना सदर क्षेत्र से विधायक बने थे। यद्यपि कि बाद में वह समाजवादी पार्टी में चले गये लेकिन सदर क्षेत्र को अपना दल में हाजी मुन्ना ने ही प्रवेश दिया था। अपना दल के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए उनकी बेटी अनुप्रिया पटेल से भाजपा ने गठबंधन कर लिया था लेकिन इस चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अनुप्रिया की मां तथा बहन से समझौता कर अपना दल में भी दो फाड़ कर दिया है।