विधानसभा चुनाव : पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने ही बुने जाल फंस रही सपा, जानें पूरा मामला

सपा-रालोद की 29 प्रत्याशियों की पहली लिस्ट में 9 मुस्लिमों के नाम से जाटों और किसानों में आक्रोश
– रालोद से जाट समुदाय के उम्मीदवार उतारने की मांग करने वाले किसान खुद को महसूस कर रहे हैं ठगा
– किसान आंदोलन के दौरान सपा और रालोद नेताओं के किए गए वादों से मुकरने से किसान आहत
– किसान और जाट बाहुल्य क्षेत्रों से मुस्लिम कैंडिडेट उतारने से सियारी पारा चढ़ा, विरोध और आक्रोश बढ़ा

लखनऊ।  समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के गठबंधन की पहली सूची में मुस्लिमों को तरजीह देने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सियासी पारा चढ़ गया है। इससे किसान और खासकर जाट अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं और धीरे-धीरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। कई जगह पर इस आग की आंच सपा-रालोद गठबंधन को महसूस भी होने लगी है। ऐसे में सपा अपने ही बुने जाल में फंसती हुई दिखाई दे रही है।

सपा और आरएलडी की ओर से जारी की गई प्रत्याशियों की पहली सूची उनके गले की फांस बनती दिख रही है। कुछ समय पहले तक पश्चिमी यूपी में जो माहौल और समीकरण सपा के पक्ष में बनता दिखाई दे रहा था वह बिखरता जा रहा है और इसका सीधा लाभ भाजपा को मिलता दिख रहा है।
किसान और रालोद समर्थकों को उम्मीद थी कि जयंत चौधरी ज्यादा से ज्यादा जाट समुदाय और पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं को टिकट देंगे, लेकिन सपा-रालोद की पहली सूची में 29 में से 9 मुस्लिम समुदाय के प्रत्याशियों को मैदान में उतारने से जाटों और किसानों का गुस्सा सतह पर आ गया है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जानकारों का कहना है कि किसानों और जाटों को उम्मीद थी कि उन्हें सपा-रालोद टिकट में बड़ी हिस्सेदारी देंगे लेकिन 29 में 9 मुसलमानों को टिकट देकर गठबंधन ने उनकी उम्मीदों पर कुठाराघात किया है। साथ 20 सीट पर ब्राह्मण, गुर्जर, ओबीसी और दलित सभी की हिस्सेदारी है।

ऐसे में किसी भी वर्ग को ज्यादा से ज्यादा 3 से 5 पांच सीटें ही मिल सकती हैं। इसे किसान और जाट किसान आन्दोलन के दौरान किए वादे से मुकरने के तौर पर भी देख रहे हैं। उस वक्त सपा-रालोद ने जाटों और किसानों से बड़ी हिस्सेदारी का वादा किया था, जो अब पूरा होता नहीं दिख रहा है। कैराना से सपा के नाहिद हसन को टिकट दिया गया, जिनके मुकदमों की लंबी फेरिस्त है और वह अभी जेल में है। किठौर से सपा ने शाहिद मंजूर को उम्मीदवार बनाया है। मेरठ से सपा के रफीक अंसारी को टिकट दिए जाने से भी माहौल में गर्मी है। बागपत से रालोद के अहमद हमीद को उम्मीदवार बनाया गया, जबकि बागपत जाटों का गढ़ माना जाता है। हापुड़ जिले की विधानसभा सीट धौलाना में भी जाटों और किसानों की बड़ी संख्या है जहां से सपा के असलम चौधरी को टिकट दिया गया है। इसी तरह से बुलंदशहर से रालोद के हाजी यूनुस स्याना से रालोद के दिलनवाज खान, कोल से सपा के सलमान सईद और अलीगढ़ से सपा के जफर आलम को टिकट दिया है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत पर खास नजर रखने वाले कहते हैं कि प्रत्याशियों की पहली सूची को ध्यान से देखा जाय तो समाजवादी पार्टी और आरएलडी गठबंधन में मुसलमान वोटों को अपने पक्ष में करने की छटपटाहट साफ नजर आती है। ऐसे में गठबंधन जाटों और किसानों की अनदेखी भी कर रही है। प्रत्याशियों का चयन सपा-रालोद गठबंधन के लिए एक तरफ कुआं और एक तरफ खाई साबित हो रहा है। कहीं गठबंधन की हालत ऐसी न हो जाय कि माया मिले न राम। वहीं भाजपा अपने तौर पर स्पष्ट दिखती है। उसने टिकट बांटने में सभी वर्गों का ध्यान रखा है। साथ भाजपा सरकार द्वारा पांच वर्षों में किए गए काम जनता के सामने हैं। खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति पांच वर्षों में बहुत बेहतर हुई है। 2013 में हुए सांप्रदायिक दंगों को मुजफ्फरनगर आज भी नहीं भूला है। कैराना से सपा के नाहिद हसन को टिकट देने से समाज में पड़ी दरार और चौड़ी ही हुई है। साथ ही गठबंधन की सूची में अपराधियों के जगह पाने भी लोगों की बेचैनी बढ़ी है। जो लोग पिछले पांच वर्षों से सुख-शांति जीवन व्यतीत कर रहे हैं, उन्हें पांच साल पहले अपराधियों और माफियाओं के अत्याचार याद आने लगे हैं।

यही कारण है कि किसानों और जाटों के गुस्से की तपन भी गठबंधन को महसूस हो रही है। जगह-जगह से विरोध के स्वर तेज होते जा रहे हैं। ग्रामीणों और खासकर रालोद के समर्थकों विरोध की खबरें आने लगी हैं। लोग सड़क पर आकर विरोध कर रहे हैं। ऐसे में सपा-रालोद गठबंधन की जो बढ़त दिखाई दे रही थी, वह अब तेजी से कम होती जा रही है और भाजपा को स्वतः ही फायदा हो रहा है।