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मिशन-2022 : धर्मकर्म के एजेंडे पर आई विपक्ष की सियासत

लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी के बाद अब विपक्षी दल भी एक-एक करके धर्म-कर्म की राजनीति को सत्ता पाने का सुगम उपाय मान रहे है। जयश्रीराम के नारों के साथ प्रदेश और केन्द्र में पूर्णबहुमत के साथ भाजपा के सत्तारूढ़ होने के बाद अब सपा बसपा समेत कांग्रेस को भी लगने लगा है कि बिना राम के नाम के राजनीति में काम नहीं बनने वाला। इसीलिए सारी पार्टियां अब बिना हिचक न सिर्फ मंदिरों में की डय़ोढ़ी पर माथा टेक रही है बल्कि अपनें को सबसे बड़ा हिन्दूवादी साबित करने में लगी है। एक के बाद मिल रही शिकस्त से हालबेहाल कांग्रेस भी अब मंदिरों में पूजापाठ करके अपने पुराने दिनों की वापसी की आस में है तो सपा-बसपा भी इससे अछूती नहीं है।

बसपा ने अपने प्रबुद्व सम्मेलनों की शुरूआत की अयोध्या से शुरू की थी। पहले बसपा अपने इन सम्मेलनों को ब्राम्हण सम्मेलन के नाम से आयोजित करने वाली थी लेकिन जातीय सम्मेलनों में प्रतिबंध होने के नाते बसपा ने अपने इन आयोजनों को प्रबुद्व सम्मेलन का नाम दिया। बसपा के इन सम्मेलनों में बड़ी संख्यामें ब्राम्हण घंटे घडिय़ाल और शंख और वेदमंत्रो के साथ गुंजायमान दिखे। विपक्ष के सारे दल इस समय कानून व्यवस्था महंगाई और बेरोजगारी के साथ ही धर्मकर्म पर केन्द्रित किए हुए है इससे भाजपा का यह कहना आसान हो गया है कि विपक्ष को राम की याद केवल सत्ता पाने के लिए आ रही है। जबकि हमारे लिए भगवान राम हमेशा आराध्य रहे है। स्थिति यह हो गयी है कि बसपा के ब्राम्हणसम्मेलनोंं के बाद पार्टी मुख्यालय में होने वाली मायावती की मीटिगों में भी जयश्रीराम के नारों की गंूज सुनाई पड़ रही है। हालांकि इससे पहले 2007के विधानसभा चुनाव में जब मायावती ने बड़ी संख्या में ब्राम्हणों को टिकट दिया था तब यह नारा बुलन्द हुआ था कि ब्राम्हण बटन दबाएगा हांथी दिल्ली जायेगा।

इसी का परिणाम था कि २००७ में मायावती को पहली बार पूर्णबहुमत मिला था और ऐसी पहली सीएम बनी जिन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। कांग्रेस के पूर्व राष्टï्रीय अध्यक्ष और अमेठी से चार बार सांसद रहे राहुल गांधी पिछले दिनों करीब ढाईसाल बाद अमेठी पहुंचे तो उन्होंने अपने को हिन्दू बताया और हिन्दुत्व के नाम पर राजनीति करने वालों को हिन्दुत्वादी बताया था। इससे पहले पांच राज्यों के चुनाव में उन्होंने दक्षिण के कुछ राज्यों में मंदिरों में जाकर पूजनअर्चन किया। जिसकी तस्वीरें भी मीडिया में छायी रही। जबकि उनकी बहन प्रियंका गांधी जो इस समय प्रदेशकांग्रेस की प्रभारी है और प्रदेश में कांग्रेस का चेहरा है। वे भी प्रचार अभियान के दौरान रास्तों में पडऩे वालें मंदिरों में माथा टेक रही है। बसपा और कांग्रेस के भक्तिभाव से प्रेरित होकर मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी भी कहां पीछे रहने वाली है।

उसने तो बहुत पहले ही एलान कर रखा है कि सरकार बनी तो राजधानी में भगवान परशुराम का विशाल मंदिर बनायेगी। मंदिरों में जाकर माथा टेंकनें में अखिलेश भी राहुल और प्रियंका से पूजा पाठ करने में किसी से पीछे नहीं दिख रहे है। अयोध्या में भव्य राममंदिर का निर्माण प्रशस्त होने के बाद इस चुनाव में भाजपा नए नारे के साथ मैंदान में आ रही है कि अयोध्या काशी झांकी है अभी मथुरा बाकी है। भाजपा के इस नारे विपक्षी दलों की नींद उड़ा दी है। भाजपा हमेशा हिन्दुत्व के साथ मंदिर के मुद्दे पर धर्म की राजनीति के करने के लगने वाले आरोपों को खारिज करती आई लेकिन इससे राजनीति विश्लेषकों को इंकार नहीं है कि इसी राजनीति के सहारे भाजपा यूपी सहित केन्द्र और कई राज्यों में सत्तारूढ़ है। जो राजनीतिक पार्टियां धर्मकी राजनीति से दूररहकर धर्मनिर्पेक्ष का लबादा ओढ़कर सत्ता का रास्ता तय करने में लगी थी उन्हे अब धर्मकर्म के रास्ते ही सत्ता पाना ज्यादा आसान लग रहा है।

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