Breaking News
Home / उत्तर प्रदेश / मिशन-2022 : ओवैसी-चन्द्रशेखर खाली हाथ, नहीं मिल रहा किसी का साथ

मिशन-2022 : ओवैसी-चन्द्रशेखर खाली हाथ, नहीं मिल रहा किसी का साथ

-बसपा कांग्रेस अकेले दम पर लडऩें के फैसले पर अटल
-राजभर के सपा के साथ जाने से औवेसी अकेले पड़े
– बसपा का साथ न मिलने पर चन्द्रशेखर के मंसूबों पर फिरा पानी
-छोटी पार्टियों को साथ लेकर सौ सीटों पर लड़़ेगी एआईएमआईएम

लखनऊ। उत्तर प्रदेश इस समय पूरी तरह से एलेक्शन मोड में है। बसपा के प्रबुद्व सम्मेलनों के बाद जहां सपा कांग्रेस और भाजपा की यात्राएं यूपी मथने पर लगी है तो दूसरे राज्यों के कुछ छुटभैय्ये दल अभी गठबंधन के लिए बड़े दलों की ओर टकटकी लगाए देख रहे है। इन दलों में असदुद्दीन ओवैसी,चन्द्रशेखर रावण और आम आदमी जैसी पार्टियों को अपने साथ किसी बड़े दल की दरकार है। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी जहां सात दलों को मिलाकार हिस्सेदारी मोर्चा बना चुकी है तो सपा ने रालोद, प्रसपा, और सुभासपा का साथ मिलने के बाद अब किसी दूसरे दल को साथ लेने की संभवनाओं पर पानी फेर दिया है। बिहार,पश्चिम बंगाल और बिहार के बाद औवेसी अब यूपी में अपना दमखम दिखानें को बेकरार है। इस बावत यहां उन्होने पहले बसपा की तरफ पेंगे बढ़ाई लेकिन बात नहीं बनी। यही स्थिति आजाद समाज पार्टी के चन्द्रशेखर आजाद ने भीम आर्मीे के गठन के साथ यूपी में अपनी आमद दर्ज कराने की गरज से बसपा की ओर हांथ बढ़ाया उन्हे सफलता नहीं मिली। यदि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चन्द्रशेखर का प्रभाव माना जाता है तो मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में औवेसी की पार्टी को अपने अनुकूल माहौल देखने को मिल रहा है।

हालांकि आम आवाम से लेकर सियासी हल्कों में तक में ओवैसी की पार्टी को लेकर यह शोहरत आम हो चली है कि वे यहां गैर भाजपा को नुकसान पहुंचाकर उसकी(भाजपा)मदद करने आ रहे है। वे अपनी सभाओं में भाजपा या योगी सरकार से ज्यादा सपा को ही टारगेट कर रहे है। बसपा और कांग्रेस ने फिलवक्त अकेले दम पर चुनाव मैंदान में उतरने का एलान कर दिया है। हालांकि यूपी में अपने पांव जमाने की गरज से औवेसी काफी पहले ही ्रसुभासपा के मुखिया ओमप्रकाश राजभर के भागीदारी संकल्प मोर्चा में शामिल होकर चुनाव लडऩे की बात कही थी लेकिन राजभर के सपा में साथ जाने के बाद से उनका यह प्लान पूरी तरह से फेल हो गया। अब वे बिलकुल अकेले है। सपा को राजभर के साथ अपने चाचा शिवपाल का साथ भी मिल गया है। रालोद के साथ उनका गठबंधन पहले ही हो चुका है। हालांकि औवेसी से गठबंधन करने से सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने काफी पहले ही मना कर दिया था। अखिलेश के औवेसी के साथ न जाने की एक बड़ी वजह यह भी हो सकती है कि वे जानते है कि २०१७ के चुनाव में औवेसी की पार्टी एआईएमआईएम ने जितनी सीटों पर भी चुनाव लड़ा था सब पर उसकी जमानत जब्त हो गयी थी। बिहार में पांच सीटे मिलने के बाद आत्मविश्वास से लबरेज औवेसी कुछ चिल्लर पार्टियों के साथ सौ सीटों पर चुनाव लडऩे की बात कह रहे है। राजनीतिक जानकारों की माने तो यदि औवेसी यूपी में दमखम दिखाने की जिद पर अड़े रहे तो इसका सीधा नुकसान गैर भाजपा दलों जिनमें सपा क ांग्रेस और बसपा शामिल है को होगा।

इनमे ंसबसे ज्यादा नुकसान सपा को होगा इस संभावना से राजनीतिक प्रेक्षकों को इंकार नहीं है। यूपी में इस समय १९ फीसदी मुस्लिम है इस वोट बैंक पर सपा बसपा और कांग्रेस तीनों ही अपना दावा ठोंकती है लेकिन हकीकत में देखा जाए तो इस वोट बैंक पर समाजवादी पार्टी का ही खासा प्रभाव है। इसलिए सबसे ज्यादा डर सपा को औवेसी का ही सता रहा है। औवेसी की भांति आजाद समाज पार्टी जिसके मुखिया चन्द्रशेखर आजाद जिनका दलित वोटबैंक के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर भी खासा प्रभाव माना जाता है। वे भी काफी इच्छुक है उन्हे बसपा साथ मिल जाए।

इस बावत वे कई बार कह भी कह चुके है कि उन्हे (बुआ) का आर्शीवाद मिल जाए तो वे उनके साथ जाना चाहेगे। लेकिन बसपा प्रमुख मायावती ने साफ कर दिया है कि वे किसी से तालमेल नहीं करेगी बल्कि अपने दम पर अकेले चुनाव लड़ेगी। बता दे २०१९ का लोकसभा चुनाव सपा के साथ मिलकर लड़ी थी लेकिन इस चुनाव में दोनों के रास्ते अलग है।

चन्द्रशेखर आजाद की तरह ही दिल्ली के सीएम और आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल दिल्ली के आस-पास(एनसीआर) के कुछ जिलों में अपने उम्मीदवार उतारना चाहते है। उनकी पार्टी के सांसद संजय सिंह गठबंधन को लेकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव से कई बार मिल चुके है लेकिन अभी तक सपा में इस बारे में अभी कोई निर्णय नहीं लिया गया है। हालंाकि आम आदमी पार्टी इस बात के लिए काफी लालयित है कि उसका सपा से तालमेल हो जाए। अब सपा अकेले साढ़े तीन सौ सीटों पर अकेले लडऩे की बात कह रही है तो उसे बाकी तिरपन सीटों पर रालोंद,सुभासपा,प्रसपा को भी सीटे देनी होगी। ऐसे किसके हिस्से में कितने सीटे आयेगी। इसबारे मे कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा।

 

Check Also

प्रतापगढ़ : 42 वर्षों से रामपुर खास में फहरा रहा है कांग्रेस का झण्डा

– पिता से विरासत में मिली विधायिकी को बचाना मोना के लिये चुनौती लालगंज, प्रतापगढ़। ...