भाजपा को अपना दुर्ग बचाने के लिए करनी होगी कड़ी मशक्कत तो सपा अपना पुराना गढ़ बनाने के लिए करेगी जंग

कभी दो विधायक तो अरसे तक राममय और पिता पुत्र की राजनीतिक भूमि रही है मिश्रिख विधानसभा
युवा वोटर और नोटा भी रहेगा निर्णायक

नैमिषारण्य-सीतापुर। मिश्रिख विधानसभा की मुख्य रूप से पहचान सभी 18 पुराणों में वर्णित विश्वविख्यात नैमिषारण्य तीर्थ व महर्षि दधीचि की विश्वकल्याण के लिए अस्थि दान भूमि मिश्रिख तीर्थ के रूप में है। इस विधानसभा सीट के सियासी महत्व का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते है कि नैमिषारण्य तीर्थ व मिश्रिख विधानसभा का नाम खुद पीएम मोदी व सीएम योगी कई चुनावी जनसभाओं सहित अपने वक्तव्यों में करते रहते है वहीं ये विधानसभा 1993 से 2017 तक सपा का गढ़ रही है।

इस कड़ी में पूर्व सीएम व सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव व पूर्व सीएम अखिलेश समेत यादव परिवार की नैमिषारण्य तीर्थ के प्रति आस्था और प्रेम भी किसी से छुपा नही है। आज भी नैमिष मिश्रिख तीर्थ में पूर्व सीएम अखिलेश यादव द्वारा सपा शासनकाल में कराए गए विकास कार्य यहां के लोगों की जुबां पर है। अगर हम मौजूदा स्थिति की बात करें तो वर्तमान में मिश्रिख क्षेत्र पूरा भाजपामय दिखता है वर्तमान में मिश्रिख लोकसभा सीट से भाजपा के ही सांसद अशोक रावत हैं वही मिश्रिख नगर पालिका की अध्यक्षा भी भाजपा द्वारा ही समर्थित सरला भार्गव है। इसी कड़ी में मिश्रिख ब्लाक प्रमुख की सीट भी हाल में ही भाजपा के नये सिपहसालार रामकिंकर पांडेय के हाथों में है। वहीं अगर क्षेत्र में जिला पंचायत सदस्य, प्रधान और बीडीसी की चर्चा करें तो वह भी कहीं न कहीं सत्ताधारी भाजपा समर्थित ही दिखते हैं।

ऐसे में मिश्रिख विधानसभा सीट कही न कही सूबे के प्रमुख सियासी दल भाजपा के साथ ही विपक्षी दल सपा और बसपा के लिए नाक का सवाल बनी हुई है, और हो भी क्यों न, मिश्रिख विधानसभा सीट वर्ष 1993 से वर्ष 2012 तक समाजवादी पार्टी के खाते में दर्ज रही है। वर्ष 2017 में मोदी लहर में सपा का ये मजबूत दुर्ग ढह गया और राम कृष्ण भार्गव यहां से कुल मतदान के 39.33% वोट पाकर विधायक चुने गए तब से साल दर साल यहां भाजपा का गढ़ मजबूत होता चला गया। ऐसे में इस बार जहां सपा इस सीट को फिर से अपने पाले में करने के लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगा रही है वहीं विधानसभा चुनाव में यहां हमेशा सेकेंड पोजिशन पर रहने वाली बसपा भले ही यहां से कभी विधानसभा चुनाव न जीती हो पर वर्ष 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा के अशोक रावत मिश्रिख लोकसभा सीट से सांसद रहे है। ऐसे में बसपा यहां हाल फिलहाल तो शांत दिख रही है पर यहां का इतिहास गवाह है कि बसपा का वोटर यहां जीत की ओर बढ़ते किसी भी दल की चुनावी गणित बिगाड़ने में सक्षम है। ऐसे में भाजपा के सामने इस बार हर हाल में इस सीट को बचाने की चुनौती है। उस पर सियासी जानकारों की माने तो इस बार सर्वे में इस सीट पर मतदाताओं का मिजाज कुछ विपरीत दिख रहा है उस पर इस बार मतदाताओं की चुप्पी इस सीट का पॉलिटिकल टेम्परेचर और बढ़ा रही है। ऐसे में जनपद की हॉट सीट मानी जा रही मिश्रिख विधानसभा में इस बार मौजूदा विधायक व भाजपा प्रत्याशी रामकृष्ण भार्गव व सपा द्वारा सम्भावित प्रत्यासी व पूर्व मंत्री रामपाल राजवंशी के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिलनी तय है।

कभी दो विधायक तो अरसे तक ष्राममयष् और पिता पुत्र की राजनीतिक भूमि रही है मिश्रिख विधानसभा सीट

मिश्रिख विधानसभा सीट 1952 में वजूद में आई। 1952 के पहले चुनाव में यहां से कांग्रेस के गंगाधर शर्मा और दल्ला राम ने बाजी मारी वहीं 1957 में निर्दल प्रत्याशी मूलचंद और अवधेश कुमार यहां से विधायक बने थे। उस वक्त इस विधानसभा में दो निर्वाचन क्षेत्र हुआ करते थे। चुनाव विश्लेषकों के अनुसार 2 सदस्यीय सीट होने और उनके अलग-अलग वर्ग के लिए आरक्षित होने को लेकर धारणा थी कि आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर पिछड़ी व अनुसूचित जाति के प्रत्याशी को सामान्य वर्ग के प्रत्याशी से क्षेत्र में मदद मिलेगी। इस सीट पर 1974 से 1985 तक कांग्रेस के रामरतन सिंह विधायक रहे वहीं 2012 में सपा के रामपाल राजवंशी जीते और प्रदेश सरकार में मंत्री रहे। इस सीट पर जनपद की प्रमुख राजनीतिक शख्सियतों में शुमार ओमप्रकाश गुप्ता वर्ष 1989 में निर्दलीय विधायक के रूप में जीते फिर उन्होंने 1993, 1996 व 2002 के विधानसभा चुनाव में लगातार सपा की जीत का परचम फहराया। इसके बाद उनके पुत्र व राजनीतिक उत्तराधिकारी अनूप गुप्ता वर्ष 2007 में सपा के टिकट पर यहां से जीतकर विधायक बने। वर्ष 2012 में ये सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने पर अनूप गुप्ता नवसृजित महोली विधानसभा से सपा के टिकट पर चुनाव लड़े व जीत हासिल की।

दल बदले, दशक बदले पर नैमिष तीर्थ न बन सका पर्यटन स्थल
1952 से सृजित मिश्रिख विधानसभा 2022 विधानसभा चुनाव तक करीब 7 दशको की राजनीति देख चुकी है , इस दौरान यहां की जनता ने 11 विधानसभा चुनाव और 2019 तक 15 बार लोकसभा चुनाव में सियासी लोग और उनकी सियासत को नजदीक से देखा है। इस दौरान विधानसभा में कई बदलाव आये पर आज भी नैमिषारण्य तीर्थ को कोई भी सरकार पर्यटन स्थल घोषित नही कर पाई है। वही दशकों बाद भी इस विधानसभा में आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार व रेल परिवहन जैसे कई बड़े चुनावी मुद्दे है जो अभी भी अधूरे है।

युवा वोटर और नोटा भी रहेगा निर्णायक
मिश्रिख विधानसभा में इस बार 18 से 39 आयु वर्ग के 1,69,890 व 40 से 49 आयु वर्ग के 82,701 मतदाता है जिन पर सभी राजनीतिक दलों का फोकस है यहां बात बिल्कुल स्पष्ट है कि यही मतदाता इस बार मुख्य रूप से क्षेत्र के आगामी विधायक की तस्वीर साफ करेंगे। वही वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में मिश्रिख सीट से 2,222 मतदाताओं ने नोटा का विकल्प चुना था जो कि कुल पड़े वोट का 1.01प्रतिशत था। गौरतलब है कि पिछली बार रालोद समेत 5 दलों को नोटा से भी कम वोट नसीब हुए थे तो इस बार राजनीतिक दलों को इस आंकड़े पर भी गौर करना पड़ेगा।