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फतेहपुर: मंदिरों की नगरी छोटी काशी में विराजमान मीरा के गिरधर गोपाल

– मध्यकाल में मीराबाई यहां निवास कर गिरधर गोपाल को किया था स्थापित

– गंगा के तट पर स्थित में करीब आधा सैकड़ा मंदिरों के मिले भग्नावशेष

– प्राचीन काल से कार्तिक पूर्णिमा में महीने भर तक लगता था विशाल मेला

फतेहपुर, 07 जुलाई (हि.स.)। प्राचीन काल से जिले का शिवराजपुर गांव मंदिरों की नगरी के रूप में जाना जाता है। गंगा के तट पर स्थित होने के कारण भक्त गंगा स्नान के लिए आते रहते हैं और मनोकामना पूर्ण की आशा से मंदिरों में अपने आराध्य देवी-देवताओं की पूजा अर्चना करते आ रहे हैं।

मध्यकाल में भगवान कृष्ण भक्ति में लीन रहने वाली मीराबाई वृंदावन जाते समय इस पवित्र नगरी आई और यहां के मंदिरों के महात्म्य को देख-सुनकर काफी समय तक रही। उसी समय हमेशा अपने साथ रखने वाली गिरधर गोपाल की अष्टधातु के बहुमूल्य मूर्ति को स्थापित किया था। जो आज भी विराजमान हैं। यहां पर हर वर्ष कार्तिक पूर्णिमा को विशाल मेला लगता है। मंदिरों की इस नगरी के महात्म्य के चलते इस मेले में आसपास के जनपदों से भक्त लोग आते हैं।

जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर पश्चिम चौडगरा कस्बे के उत्तर गंगा तट पर स्थित है। मलवां विकासखंड के छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध शिवराजपुर गांव पुराणों में आदिकाशी के रूप में वर्णित मिलता है। कृष्ण भक्ति रस में लीन मीराबाई ने काफी समय तक प्रवास कर अपने गिरधर गोपाल की मूर्ति की यहीं स्थापना कर चली गयी। जहां आज विशाल प्राचीन भव्य मंदिर बना है।

मंदिर के महंत नंदगोपाल महाराज ने बताया कि कृष्ण भक्त मीराबाई जब यहां आई थी तो अपने साथ लिए हुए गिरधर गोपाल की मूर्ति को उन्होंने एक जगह रख दिया था। जब मीरा बाई यहां से जाने लगी तो उन्होंने मूर्ति को साथ ले जाने का प्रयास किया लेकिन गिरधर गोपाल की मूर्ति अपने स्थान से नहीं उठी तो मीरा ने गंगा के तट पर गिरधर गोपाल की मूर्ति स्थापित करके कृष्ण गान करते हुए चली गई थी। गिरधर गोपाल के इसी स्थान पर विशाल मंदिर बनाया गया है। गांव में आज भी तमाम मंदिरों के होने के साक्ष्य मिल रहे हैं। जिन्हें ईंट चोरों ने धीरे धीरे मिटाते जा रहे हैं। इस स्थान से हाल ही में महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक काल के अवशेष मिले हैं, जो ताम्रयुगीन बताये जाते हैं। यहां कई प्राचीन मन्दिर भी हैं और इस स्थान को तीर्थ रूप में मान्यता प्राप्त है।

ग्राम प्रधान सूरजपाल यादव ने बताया कि यहां कार्तिक पूर्णिमा के समय लगने वाला मेला अति प्राचीन है। इस ऐतिहासिक मेले में आसपास के तो आते हैं। साथ ही दूर-दूर से लोग आते है। ऊंट, घोड़े व खच्चर, गधोंं के खरीद-विक्री के लिए अन्य प्रांतों से भी व्यापारी आते हैं। चार-पांच दशक पूर्व जब मेले आमजन के जीवन की सभी आवश्यताएं पूरी करते थे तब यह मेला एक महीने तक रहता था। जहां हर घरेलू सामान साल में एक बार मेले से खरीदने के लिए लोग जरूर आते थे।

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